Friday, October 30, 2015

BHAGWAN PARSHU RAM भगवान् परशुराम

BHAGWAN PARSHU RAM
भगवान् परशुराम
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
भगवान् परशुराम  का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। उन्होंने अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी तथा अन्य क्षत्रियों का पृथ्वी से 21 बार संहार किया। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है, नाकि अपनी प्रजा से आज्ञा पालन करवाना। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान् नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम जी के रूप में अवतार धारण किया था। परशुराम जी ने जंभासुर का मस्तक विदीर्ण किया। शतदुंदभि को मारा। सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए शाल्व से युद्ध करते रहे; किंतु गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुँह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर भगवान् विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया और वन में जाकर अपने अस्त्र शस्त्र इत्यादि पानी में डुबोकर कृष्णावतार की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे।
उन्होंने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता से ग्रहण की थीं। वे पशु-पक्षियों की बोली समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही विनम्र बन जाते थे।
प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नामक महाबली राजा अपने राज्य का परित्याग करके वन में चले गये। वहाँ उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। गाधि ने ऋचीक से कहा कि कन्या की याचना करते हुए; उनके कुल में एक सहस्र पांडुबर्णी अश्व, जिनके कान एक ओर से काल हों, शुल्क स्वरूप दिये जाते हैं, अतः वे शर्ते पूरी करें। ऋचीक ने वरुण देवता से उस प्रकार के एक सहस्र घोड़े प्राप्त कर शुल्क स्वरूप प्रदान किये। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर, उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हों, तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करे और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग-अलग सेवन करना। सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्र वधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है, तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। उनके घर विश्वामित्र ने जन्म लिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्र वधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे :- रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।
भगवान् परशुराम का जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान् विष्णु के आवेशावतार हैं। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और भगवान् शिव द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये।
परशुराम जी ने शिवाराधन की। नियम का पालन करते हुए उन्होंने भगवान् शिव को प्रसन्न कर लिया। भगवान्  शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम जी ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रिया में परशुराम जी का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त भगवान् शिव ने परशुराम जी को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमें से एक दिव्य धनुर्वेद परशुराम जी ने कर्ण पर प्रसन्न होकर, उसे  प्रदान किया।
उनकी आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान् शिव के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। भगवान् शिव से उन्हें भगवान् श्री कृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्र तीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान्  विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजो हरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वरदान दिया।
वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है :-
ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।
उन्होंने युद्ध की शिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही देने का निश्चय किया था तथापि माता गँगा के पुत्र देवव्रत को उन्होंने शस्त्र और शास्त्र का पूरा ज्ञान प्रदान किया। 
भीष्म पितामह और आचार्य द्रोण गुरु भाई थे। द्रोणाचार्य द्वारा शिक्षा दिये जाने से इंकार करने पर सूर्य पुत्र कर्ण उनके पास गया और स्वयं को ब्राह्मण बताकर उसने भगवान् परशुराम जी से शिक्षा ग्रहण की। भगवान् परशुराम ने उसके तेज को देखकर ही शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। जब परशुराम जी उसकी जाँघ पर सिर रखकर सो रहे थे, तब एक कीड़े के काटने से उसकी जाँघ से खून निकला, जो कि परशुराम जी के ऊपर गिरा, जिससे उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कहा कि इतना कष्ट तो केवल एक क्षत्रिय ही झेल सकता था, अतः उन्होंने कर्ण से अपना वर्ण बताने को कहा। उसकी गलत ब्यानी से रुष्ट होकर, उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि उनकी प्रदान की गई विद्या उसके काम उस समय नहीं आएगी, जब उसे उसकी सबसे अधिक जरूरत होगी।
श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्ड स्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।
अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम जी ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला। उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया तो परशुराम जी ने उन सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा, जिसको जमदग्नि ने पूरा किया। 
सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था, जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त। महिष्मन्त ने ही नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम जी के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे। कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण :: रेणुका के गर्भ से जमदग्नि ऋषि के वसुमान आदि कई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे परशुराम जी थे। उनका यश सारे संसार में प्रसिद्ध है। हैहयवंश का अन्त करने के लिये स्वयं भगवान् ने ही परशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया। यद्यपि क्षत्रियों ने उनका थोड़ा-सा ही अपराध किया था, फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणों के द्रोही-अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वी के ऊपर भार स्वरूप हो गये थे और इसी के फलस्वरूप भगवान् परशुराम ने उनका नाश करके पृथ्वी का भार उतार दिया।
राजा परीक्षित ने पूछा :- भगवन! अवश्य ही उस समय के क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुराम जी का ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार-बार क्षत्रियों के वंश का संहार किया।
श्री शुकदेवजी कहने लगे :- परीक्षित! उन दिनों हैहयवंश का अधिपति था, अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकार की सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हज़ार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्ध में पराजित न कर सके, यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियों का अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपा से प्राप्त कर लिये थे। वह योगेश्वर हो गया था। उसमें ऐसा ऐश्वर्य था कि वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल रूप धारण कर लेता था। उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वह संसार में वायु की तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता। एक बार गले में वैजयन्ती माला पहने, सहस्त्रबाहु अर्जुन बहुत सी सुन्दरी स्त्रियों के साथ नर्मदा नदी में जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्त्रबाहु ने अपनी बाँहों से नदी का प्रवाह रोक दिया। दशमुख रावण का शिविर भी वहीं कहीं पास में ही था। नदी की धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा। रावण अपने को बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्त्रार्जुन का यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ। जब रावण सहस्त्रबाहु अर्जुन के पास जाकर बुरा भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियों के सामने ही खेल-खेल में रावण को पकड़ लिया और अपनी राजधानी माहिष्मती में ले जाकर बंदर के समान कैद कर लिया। पुलस्त्य जी के कहने से सहस्त्रबाहु ने रावण को छोड़ा था।
महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था। उन्होने दत्तात्रेय जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। दत्तात्रेय जी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान माँगने को कहा तो उसने उनसे 10,000 हाथों का के बल का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा। इसे सहस्त्राबाहु और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेय वीर भी कहा जाता है।
सहस्त्रार्जुन अपने घमंड में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। उसके अत्याचार व अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों को मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, अपने मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर, अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था, (वर्तमान काल के मुसलमानों की तरह)। 
ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। वन में आखेट करते हुए, अपनी पूरी सेना के साथ झाड़-झंकाड़ पार करता हुआ, वह जमदग्नि मुनि के आश्रम जा पहुँचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अदभुत गाय थी। महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को माँगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और काम धेनु को ले जाने लगा। काम धेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गईं।
जब भगवान् परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर काम धेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया।
सहस्त्रार्जुन के पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम जी ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका।
जमदग्नि मुनि ने कहा :- राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेव का तुमने व्यर्थ ही वध किया। बेटा! हम लोग ब्राह्मण हैं। क्षमा के प्रभाव से ही हम संसार में पूजनीय हुए हैं। और तो क्या, सबके दादा ब्रह्मा जी भी क्षमा के बल से ही ब्रह्म पद को प्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणों की शोभा क्षमा के द्वारा ही सूर्य की प्रभा के समान चमक उठती है। सर्वशक्तिमान भगवान् श्री हरि भी क्षमावानों पर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं। बेटा! सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बढ़कर है। जाओ, भगवान् का स्मरण करते हुए तीर्थों का सेवन करके अपने पापों को धो डालो। तीर्थाटन के पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। परशुराम जी ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किये थे। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया। परशुराम जी ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये। तत्पश्चात परशुराम जी ने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
कैलाश स्थित भगवान् शिव के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम जी ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान् श्री कृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुराम जी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे वे एकदन्त कहलाये [ब्रह्मवैवर्त पुराण]
देव शिल्पी विश्वकर्मा जी ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। उनमें से एक तो देवताओं ने भगवान् शिव को अर्पित कर दिया था और दूसरा भगवान् श्री हरी विष्णु को। देवताओं के यह पूछने पर कि भगवान् शिव और भगवान् विष्णु में कौन श्रेष्ठ है, ब्रह्मा जी ने मतभेद पैदा कर दिया। फलस्वरूप भगवान् विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख भगवान् शिव का धनुष शिथिल पड़ गया था। अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुष से हो सकती थी। शान्त होने पर भगवान् शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को और भगवान् विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था, जो कि परशुराम जी को प्राप्त हुआ।
उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय भगवान् शिव का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही बताते हुए
"बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये" 
और क्रोधान्ध हो 
"सुनहु राम जेहि शिव धनु तोरा, सहस बाहु सम सो रिपु मोरा"
तक कहा। परशुराम जी ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही और उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। भगवान् श्री राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। भगवान् श्री राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम जी के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः भगवान् श्री राम के पास लौट आया।संशय मिटते ही परशुराम जी ने वैष्णव धनुष भगवान् श्री राम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए 
"अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमा मन्दिर दोउ भ्राता"
और
"कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू"।
भगवान् श्री राम ने परशुराम जी को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने भगवान् श्री राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम जी एक वर्ष तक लज्जित, तेज हीन तथा अभिमान शून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।[रामचरित मानस]
दशरथ नन्दन भगवान् श्री राम ने जमदग्नि कुमार परशुराम जी का पूजन किया और परशुराम जी ने भगवान् श्री राम की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया। जाते-जाते भी उन्होंने भगवान् श्री राम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणार विन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।[वाल्मीकि रामायण] 
भीष्म पितामह द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम जी के पास आयी। तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच 23 दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम जी उन्हें हरा न सके।[महाभारत] 
परशुराम जी अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके। परशुरामजी ने कहा :-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।
परशुराम जी, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही कल्कि को भगवान् शिव की तपस्या करके उनके दिव्यास्त्र को प्राप्त करने के लिये कहेंगे।[कल्कि पुराण]
भगवान् परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम जी ने केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं। वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।
असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुण्ड है, जहाँ तप करके उन्होंने भगवान् शिव से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम जी ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जायेंगे।
भगवान् परशुराम द्वारा क्षत्रियों का 21 बार संहार :- 
Jamdagni's cow :-  Sahastr Bahu (Thousand-armed) Haehay king, Kart Veery Arjun, destroyed Jamdagni's hermitage and captured the calf of Kam Dhenu. To retrieve the calf, Jamdagni's son Bhagwan Parshu Ram slew the king, whose sons in turn killed Jamdagni. Parshu Ram then destroyed the Kshatriy (warrior, marshal castes) race 21 times and his father was resurrected by divine grace.
भगवान् परशुराम, भगवान् विष्णु के छठे अवतार हैं। उन्होंने तत्कालीन अत्याचारी और निरंकुश क्षत्रियों का 21 बार संहार किया। महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था। उन्होंने दत्तात्रेय-दत्तत्राई को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। दत्तत्राई उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान माँगने को कहा तो उसने दत्तत्राई से 10,000 हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा। इसे सहस्त्राबाहू और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेयवीर-कार्तवीर्य भी कहा जाता है। 
वो घमंड में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ गया। उसके अत्याचार व अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों को मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, यहाँ तक की उसने अपने मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था। 
भगवान् परशुराम के पिता, जमदग्नि ऋषि के पास कामधेनु थी। महिष्मति पुरी  का राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन उनके आश्रम में पहुँचे तो महर्षि ने उनका यथोचित स्वागत किया। उसने महर्षि से कामधेनु माँगी। जब महर्षि ने कामधेनु देने में असमर्थता व्यक्त की तो सहस्त्रार्जुन ने बल पूर्वक कामधेनु को आश्रम से ले गया। जब परशुराम आश्रम लौटे तब महर्षि ने उन्हें बताया कि सहस्त्रार्जुन कामधेनु को ले गया है। परशुराम जी उसी क्षण सहस्त्रार्जुन के महल को गये और उसे कामधेनु लौटाने के लिये कहा। सहस्त्रार्जुन ने कहा कि वह गाय वापस नहीं करेगा। ऊसने अपने सैनिकों को आदेश दे दिया, परशुराम जी को पकड़ कर कैद कर लिया जाये। परशुराम ने क्रोध में भरकर सभी सैनिकों को मार दिया। सहस्त्रार्जुन अपने सभी सैनिकों और पुत्रों सहित परशुराम से युद्ध करने लगा।
सहस्त्रार्जुन को दत्तात्रेय भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था कि उसे पृथ्वी पर उसे कोई क्षत्रिय राजा हरा नहीं सकता एवं युद्ध के समय उसके हजारों हाथ होंगे। अत: वह अपने हजारों बाहु के साथ लड़ने लगा। सहस्त्रार्जुन और  भगवान् परशुराम का युद्ध हुआ। भगवान् परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान् परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़ परशु से काटकर उसका वध कर दिया।
परशुराम जी ने उसके अधिकांश सैनिकों व पुत्रों को मार डाला। इसके बाद परशुराम कामधेनु को लेकर आश्रम लौट आये। महर्षि जमदग्नि ने कहा कि परशुराम जी को प्रायश्चित करना होगा। परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गये।
जब सहस्त्रार्जुन के बचे हुए पुत्रों को जब पता चला कि परशुराम तीर्थ यात्रा पर गये हैं तो वे सब बदला लेने के लिये आश्रम पहुँचे। उस समय आश्रम में केवल माता रेणूका और महर्षि जमदग्नि थे। सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते हुए, आश्रम को जला डाला। उन्होंने ध्यानमग्न महर्षि जमदग्नि का सिर काट दिया और माता रेणुका को मारने लगे। माता रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम को पुकारा। परशुराम जी माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुँचे तो उन्होंने माता को विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 घाव देखे। भगवान् परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश ही करेंगे बल्कि समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहीन कर देंगे। भगवान् परशुराम ने  21  बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्त पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवरों को भर कर अपने संकल्प को पूरा किया। महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान् परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका तब जाकर किसी तरह भूलोक पर क्षत्रियों का विनाश रुका। तत्पश्चात भगवान् परशुराम ने अपने पितरों के श्राद्ध क्रिया की एवं उनके आज्ञानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ किया। अपने पिता का शरीर भाईयों के पास छोड़कर, सहस्त्रार्जुन के महल में गये। वहाँ परशुराम जी ने सहस्त्रार्जुन के बचे हुये पुत्रों को मार डाला। आश्रम लौट कर वे पिता के शरीर को लेकर कुरुक्षेत्र गये और वहाँ पर मंत्र शक्ति से पिता के सिर को जोड़कर उन्हें जीवित कर दिया और उन्हें सप्तऋषि मंडल में सातवें ऋषि के रूप में स्थापित कर दिया।
    
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Sunday, July 12, 2015

राज ऋषि विश्वामित्र ASCETIC VISHAWAMITR

राज ऋषि विश्वामित्र
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
विश्वामित्र अत्रिवंशी ययाति कुल से हैं। उनका स्थान सप्त ऋषियों में है। 
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्॥
सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं :- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज।[विष्णु पुराण]
कुशिक वंश में  उत्पन्न चन्द्रवंशी महाराज गाधि को सत्यवती नामक एक श्रेष्ठ कन्या हुई। जिसका विवाह मुनि भृगु पुत्र ऋचीक के साथ सम्पन हुआ। ऋचीका ने पति की सेवा की जिससे प्रसन्न उन्होंने अभिमंत्रित चरु सत्यवती को प्रदान करते हुए कहा, "देवि! यह दिव्य चरु दो भागों में विभक्त है। इसके भक्षण से तुम्हें यथेष्ट पुत्र की प्राप्ति होगी। इसका एक भाग तुम ग्रहण करना और दूसरा भाग अपनी माता को दे देना। इससे तुम्हें एक श्रेष्ठ महातपस्वी पुत्र प्राप्त होगा और तुम्हारी माता को क्षत्रिय शक्ति सम्पन्न  तेजस्वी पुत्र होगा"। सत्यवती यह दोनों चरु-भाग प्राप्त कर बड़ी प्रसन्न हुई।
अपनी श्रेष्ठ पत्नी सत्यवती को ऐसा निर्देश देकर महर्षि ऋचीक तपस्या के लिये अरण्य में चले गये। इसी समय महाराज गाधि भी तीर्थ दर्शन के प्रसंगवश अपनी कन्या सत्यवती का समाचार जानने आश्रम में आये। इधर सत्यवती ने पति द्वारा प्राप्त चरु के दोनों भाग माता अपनी माँ दे दिये और दैवयोग से माता द्वारा चरु-भक्षण में विपर्यय हो गया। जो भाग सत्यवती को प्राप्त होना था, उसे माता ने ग्रहण कर लिया और जो भाग माता के लिये उद्दिष्ट था, उसे सत्यवती ने ग्रहण कर लिया। ऋषि-निर्मित चरु का प्रभाव अक्षुण्ण था, अमोघ था। चरु के प्रभाव से गाधिपत्नी तथा देवी सत्यवती दोनों में गर्भ के चिह्न स्पष्ट होने लगे।
इधर ऋचीक मुनि ने योग बल से जान लिया कि चरु भक्षण में विपर्यय हो गया है। यह जानकर सत्यवती निराश हो गयीं, परन्तु मुनि ने उन्हें आश्वस्त किया। यथा समय सत्यवती की परम्परा में पुत्र रूप में जमदग्नि पैदा हुए और उन्हीं के पुत्र परशुराम हुए। दूसरी ओर गाधि पत्नी ने चरु के प्रभाव से दिव्य ब्रह्मशक्ति-सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र को पुत्र  रूप में प्राप्त किया। 
महर्षि विश्वामित्र के अनेक पुत्र-पौत्र हुए, जिनसे कुशिक वंश विख्यात हुआ। ये गोत्रकार ऋषियों में परिगणित हैं। आज भी सप्तर्षियों में स्थित होकर महर्षि विश्वामित्र जगत के कल्याण में निरत हैं।[पुराण, महाभारत]
उन्होंने ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हेतु तपस्या की। भूख लगने पर चाण्डाल के घर में घुसकर सूअर का माँस चुराकर खाया। राजा हरिश्चन्द्र को परीक्षा के बहाने पीड़ित किया। तपस्या भंगकर शकुन्तला पैदा की। त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का प्रयास किया। गुरु वशिष्ठ से अकारण वैर किया। भगवान् श्री राम और लक्ष्मण जी को लेकर जंगलों में राक्षसों का वध कराया। भगवान् श्री राम  लक्ष्मण को लेकर माता सीता स्वयंवर में गये जहाँ राजा जनक की पुत्रियों का विवाह राजा दशरथ के  सम्पन्न हुआ। एक महान तपस्वी के रूप में उन्होंने ब्रह्मऋषि पद प्राप्ति का सफल प्रयास किया मगर मोक्ष या ईश्वर भक्ति की इच्छा नहीं की।
वशिष्ठ जी के कहने पर ही महाराज दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। विश्वामित्र ने इनके 100 पुत्रों को मार दिया था, फिर भी इन्होंने विश्वामित्र को माफ कर दिया। विश्वामित्र की उनके साथ जन्मजात शत्रुता थी। एक समय में तो इन दोनों ने कुक्कुट-मुर्गे के रूप में भी युद्ध किया। विश्वामित्र उनसे स्पर्धा के कारण ही ब्रह्मऋषि बनना चाहते थे।
ऋषि भले ही बन गये, मगर उनकी मूल प्रवृत्तियाँ उनमें कायम रहीं। उनमें ब्राह्मणोचित गुणों अभाव बना ही रहा।
वैश्वामित्र मण्डल का वैशिष्ट्य :: वेद की महिमा अनन्त है। विश्वामित्र के द्वारा दृष्ट यह तृतीय मण्डल विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी तृतीय मण्डल में ब्रह्म गायत्री का जो मूल मन्त्र है, वह उपलब्ध होता है। इस ब्रह्म गायत्री मन्त्र के मुख्य द्रष्टा तथा उपदेष्टा आचार्य महर्षि विश्वामित्र ही हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त का दसवां मन्त्र गायत्री मन्त्र के नाम से विख्यात है, जो इस प्रकार है :-
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
गायत्री को वेद माता कहा जाता है। 
ये मन्त्रष्टा ऋषि कहलाते हैं। वेद के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल, जिसमें 62 सूक्त हैं, इन सभी सूक्तों के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र ही है। इसीलिये तृतीय मण्डल 'वैश्वामित्र मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में इन्द्र, अदिति, अग्निपूजा, उषा, अश्विनी तथा ऋभु आदि देवताओं की स्तुतियाँ हैं और अनेक ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म आदि की बातें विकृत हैं, अनेक मन्त्रों में गो-महिमा का वर्णन है। तृतीय मण्डल के साथ ही प्रथम, नवम तथा दशम मण्डल की कतिपय ऋचा के दृष्टा विश्वामित्र के मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्र हुए हैं।
 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Sunday, May 10, 2015

SHUKRACHARY-SON OF BHRAGU शुक्राचार्य :: भृगु पुत्र

शुक्राचार्य
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥10.37॥
श्री शुक्र मंत्र :: हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम् सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।
वृष्णि वंशियों में वासुदेव पुत्र श्री कृष्ण और पाण्डवों में अर्जुन में हूँ। मुनियों में वेद व्यास और कवियों में कवि शुक्राचार्य भी में ही हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 10.37] 
I am Shri Krashn, the son of Vasu Dev among the Vrashni clan, Arjun among the Pandavs, Ved Vyas among the saints and Shukrachary among the poets.


भगवान् श्री कृष्ण ने स्वयं को वृष्णि वंश में उत्पन्न विभूति कहा है, न कि अवतार जो कि वे हैं। पाण्डवों में अर्जुन उनकी एक श्रेष्ठ मूर्ति हैं। वेद का चार भागों में विभाजन, पुराण, उपपुराण और महाभारत रचना उनकी श्रेष्ठतम विभूतियाँ हैं, जो कि जन कल्याण की लिए प्रकाशित की गई हैं। धर्म से जुड़ी हुई कोई भी रचना व्यास जी की देन ही मानी जानी चाहिए। शुक्राचार्य को कवि के रूप में उनकी विभूति समझना चाहिए।

The Almighty revealed that HE as the son of  Vasu Dev Ji, in the Vrashni Vanshi-clan & was HIS excellent creation, along with Arjun who took incarnation in the Pandu clan. It might make the purpose of HIS incarnation to Arjun and all those who were listening to HIM delivering the sermon in the battle field of Kurukshetr; clear. Still there are people who do not realise the excellence of the composition of Gita as the Supreme guide for the Kali Yug by Muni Ved Vyas Ji Maha Raj, who was one of HIS incarnations and excellent among the composers. To compare the poets, HE makes it clear that Shukrachary is HIS supreme form as a poet. Therefore, Veds, Puran, Up Puran, Vedant and Maha Bharat should not be considered poetic creations, since they reveal history, science, purpose of life, movement of soul in various incarnations, birth-death etc. Gita has been translated into almost all languages of the world. 
It has been discovered that the translation is inappropriate & not up to the mark in most all cases, sending wrong notions-messages among the masses. Some times, the interpretations too are wrong and misleading.
Its clear that the Bhagwan Shri Krashn & Arjun, both are two forms of the Almighty just like water in two pots.
दक्ष कन्या ख्याति से भृगु के पुत्र दाता (काव्य, शुक्र) हुए जिन्हें  राक्षसों के गुरु बनने के बाद शुक्राचार्य के नाम से जाना गया। दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति, जो योगशक्ति संपन्न तेजस्वी महिला थीं, दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को जीवित कर देती थीं, जिससे नाराज होकर भगवान् श्री हरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता व महर्षि भृगु जी पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। इसी कारणवश शुक्राचार्य भगवान् विष्णु के शत्रु हो गए। भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि कवियों में वे शुक्र हैं अर्थात उन्होंने शुक्राचार्य को अपना ही एक रूप बताया है। परन्तु अंततोगत्वा उन्हें अपनी गलती का अहसास हो ही गया। राक्षसों को भगवान् शिव से प्राप्त मृत संजीवनी विद्या का दुरूपयोग करने पर भगवान् शिव ने इन्हें अपने मुँह रख लिया।  वहाँ से वे भगवान् शिव के उदर में चले गए। बहुत अनुनय-विनय करने पर भगवान् शिव ने उन्हें मूत्र मार्ग से उन्हें शुक्र के रूप में बाहर निकाला तो उनका नाम शुक्राचार्य पड़ गया। 
शुक्र के दो विवाह हुए थे। इनकी पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयंती थी, जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था और उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। दूसरी स्त्री का नाम गोधा (शर्मिष्ठा) था जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे।
महर्षि  अंगिरा और भृगु  भगवान् ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। अंगिरा के पुत्र  का नाम जीव और भृगु के पुत्र का नाम काव्य था। दोनों बालक अत्यंत बुद्धिमान तथा समान आयु के थे। अपने पिताओं के समान उन दोनों में भी गहरा प्रेम था। इसलिए जब वे शिक्षा ग्रहण करने योग्य हुए तो भृगु ने निश्चय किया कि महर्षि अंगिरा ही दोनों को शिक्षा प्रदान करेंगे। अतः काव्य अंगिरा ऋषि के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करने लगा। किन्तु पुत्र मोहवश अंगिरा दोनों में भेद-भाव करने लगे। काव्य की अपेक्षा वे जीव की शिक्षा दीक्षा पर अधिक ध्यान देते थे। उन्होंने जीव को तो वेदों के गूढ़ रहस्यों से अवगत करवाया, परन्तु काव्य  को केवल उपरी ज्ञान देकर ही संतुष्ट हो गए। 
काव्य  गुरु के इस व्यवहार को सहन कर सके। एक योग्य शिष्य होने के कारण वह अपने गुरु का बहुत सम्मान करते थे। काव्य ने अंगिरा  निवेदन किया कि जिस प्रकार एक पिता के लिए उसकी दो संतानों में कोई अंतर नहीं होता, उसी प्रकार गुरु की दृष्टि में सभी शिष्य एक समान होने चाहिए। जब गुरु ही शिष्यों में भेदभाव करने लग जाए तो उसका यह व्यवहार कदापि धर्मानुकूल नहीं होता। गुरुवर  शिष्य भी पुत्र के समान होता है। इसलिए यदि जीव आपका पुत्र है तो मै भी आपके पुत्र के समान ही हूँ। कृप्या हम दोनों में कोई  भेदभाव न करें। 
अंगिरा ने काव्य  की बात अनसुनी कर दी और पहले के भांति दोनों को पृथक-पृथक पढ़ाते  रहे। अंततः काव्य आश्रम छोड़कर अपने घर लौट चले। 
मार्ग में गौतम मुनि का आश्रम था। काव्य  ने उनकी बौद्धिकता, विद्वता  और दयालुता के बारे में बहुत कुछ सुना हुआ था। ऐसे महान तपस्वी के दर्शन किये बिना चले जाना उन्हें उचित नहीं लगा। वह गौतम मुनि के पास गये और उनकी स्तुति करते हुए निवेदन किया कि हे मुनिवर! आप परम ज्ञानी और विद्वान् हैं। आपके ज्ञान की प्रसिद्धि दसों दिशाओं में गुंजायमान है। जीवन पथ पर भटकते हुए मनुष्यों ने आपके मार्गदर्शन का लाभ उठाकर सफलता प्राप्त की है। अतः मुनिवर! कृपया ज्ञान प्राप्ति के लिए योग्य गुरु के विषय में बताकर मेरा जीवन भी सार्थक करें। 
गौतम मुनि ने कहा कि हे वत्स! संसार में केवल भगवान् शिव ही एक मात्र योग्य गुरु हैं। वे ही सृष्टि के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को जानते हैं। उनके लिए कोई भी विद्या अछूती या अदृश्य नहीं है। वे चाहे तो मूर्ख को भी परमज्ञानी बना सकते हैं। उनकी पूजा आराधना मात्र से तुम उनकी कृपा दृष्टि प्राप्त कर सकते हो। भक्त वत्सल भगवान् शिव तुम्हारी सभी मनोकामनाए अवश्य पूर्ण करेंगे।  
काव्य के ह्रदय में भगवान् शिव से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई। वह उसी समय गौतमी गंगा में स्नान करके भगवान्  शिव की आराधना करने लगा। अंततः प्रसन्न होकर भगवान् शिव  साक्षात् प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहा। 
काव्य कहा कि हे तीनों लोकों के स्वामी! आपसे कोई बात छिपी नहीं है। मेरी आराधना का उद्देश्य भी आप भली भांति जानते हैं। भगवन्! मेरे लिए आप आराध्य देव और गुरु दोनों ही हैं। कृप्या मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर अनुगृहित करें। मुझे वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें  जो परम तपस्वी के लिए भी दुर्लभ है। 
भगवान् शिव ने काव्य को वैदिक और लौकिक विद्या के साथ-साथ ही मृत संजीविनी विद्या भी प्रदान की, जिससे देवगण भी अनभिज्ञ थे। इस विद्या द्वारा काव्य को किसी भी मृत प्राणी को पुनरुज्जीवित करने की शक्ति प्राप्त हो गई। 
जिस स्थान पर भगवान् शिव ने शुक्राचार्य को दर्शन दिए थे, वह स्थान शुक्र तीर्थ कहलाया।
शुक्राचार्य महर्षि भृगु के पुत्र और भक्त प्रह्लाद के भानजे शुक्राचार्य। महर्षि भृगु की पहली पत्नी का नाम ख्याति था, जो उनके भाई दक्ष की कन्या थी। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता मिले और एक बेटी लक्ष्मी का जन्म हुआ। माता लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान् श्री हरी विष्णु से कर दिया था। भृगु के और भी पुत्र थे जैसे उशना, च्यवन आदि। 
शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। इनका वाहन रथ है, उसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं। रथ पर ध्वजाएं फहराती रहती हैं। इनका आयुध दण्ड है। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 20 वर्ष की होती है।[मत्स्य पुराण]
शुक्राचार्य महान ज्ञानी के साथ-साथ एक अच्छे नीतिकार भी थे। शुक्राचार्य की कही गई नीतियां आज भी बहुत महत्व रखती हैं। आचार्य शुक्राचार्य शुक्र नीति शास्त्र के प्रवर्तक थे। इनकी शुक्र नीति अब भी लोक में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शुक्राचार्य की कन्या का नाम देवयानी तथा पुत्र का नाम शंद और अमर्क था। इनके पुत्र शंद और अमर्क हिरण्यकशिपु के यहाँ नीति शास्त्र का अध्यापन करते थे। ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है, जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है।
दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति, जो योगशक्ति संपन्न तेजस्वी महिला थीं, दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को जीवित कर देती थीं जिससे नाराज होकर श्री हरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता व भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।
जम्बूद्वीप के इलावर्त (रशिया) क्षे‍त्र में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। इस जम्बूद्वीप के बीच के स्थान में था इलावर्त राज्य। अंतिम बार संभवत: शम्बासुर के साथ युद्ध हुआ था जिसमें राजा दशरथ ने भी भाग लिया था।
मृत संजीवनी  विद्या शुक्राचार्य को भगवान् शिव से प्राप्त हुई। इस विद्या द्वारा मृत शरीर को भी जीवित किया जा सकता है। शुक्राचार्य इस विद्या के माध्यम से युद्ध में आहत सैनिकों को स्वस्थ कर देते थे और मृतकों को तुरंत पुनर्जीवित कर देते थे। शुक्राचार्य ने रक्तबीज नामक राक्षस को महामृत्युंजय सिद्धि प्रदान कर युद्धभूमि में रक्त की बूंद से संपूर्ण देह की उत्पत्ति कराई थी।
महामृत्युंजय मंत्र के सिद्ध होने से भी यह संभव होता है। महर्षि वशिष्ठ, मार्कंडेय और गुरु द्रोणाचार्य महामृत्युंजय मंत्र के साधक और प्रयोगकर्ता थे। संजीवनी नामक एक जड़ी बूटी भी मिलती है जिसके प्रयोग से मृतक फिर से जी उठता है।
शुक्राचार्य ने आरंभ में अंगिरस ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया, किंतु जब वे (अंगिरस) अपने पुत्र बृहस्पति के प्रति पक्षपात दिखाने लगे तब इन्होंने अंगिरस का आश्रम छोड़कर गौतम ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया। गौतम ऋषि की सलाह पर ही शुक्राचार्य ने भगवान् शिव की आराधना कर मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके बल पर देवासुर संग्राम में असुर अनेक बार जीते।[मत्स्य पुराण]
जब विष्णु अवतार त्रिविक्रम वामन भगवान् श्री हरी विष्णु ने वामनावतार में जब राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी तब शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप में बलि के कमंडल में जाकर बैठ गए, जिससे कि पानी संकल्प हेतु बाहर न आए और बलि भूमि दान का संकल्प न ले सकें। तब वामन भगवान् ने बलि के कमंडल में एक तिनका डाला, जिससे शुक्राचार्य की एक आँख फूट गई। इसलिए इन्हें एकाक्ष यानी एक आँख वाला भी कहा जाता है।
गौतम ऋषि की सलाह पर ही शुक्राचार्य ने भगवान् शिव की आराधना कर मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके बल पर देवासुर संग्राम में असुर अनेक बार जीते।
मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती गई और देवता असहाय हो गए। ऐसे में उन्होंने भगवान् शिव  की शरण ली। शुक्राचार्य द्वार मृत संजीवीनी का अनुचित प्रयोग करने के कारण भगवान् शिव को बहुत क्रोध आया। क्रोधवश उन्होंने शुक्राचार्य को पकड़कर निगल लिया। इसके बाद शुक्राचार्य भगवान् शिव की देह से शुक्ल कांति के रूप में मूत्र मार्ग से बाहर आए और शुक्र कहलाये और अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त किया। तब उन्होंने प्रियवृत की पुत्री ऊर्जस्वती से विवाह कर अपना नया जीवन शुरू किया। उससे उन को चार पुत्र हुए।
इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्र :- याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति। याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे, इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषक कर दिया।
दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। शर्मिष्ठा अति सुन्दर राजपुत्री थी, तो देवयानी असुरों के महा गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी। दोनों एक दूसरे से सुंदरता के मामले में कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र उतार कर स्नान करने लगीं।
उसी समय भगवान् शिव माँ पार्वती के साथ उधर से निकले। भगवान् शिव को आते देख वे सभी कन्याएं लज्जावश से बाहर निकलकर दौड़कर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगीं। शीघ्रता में शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस पर देवयानी अति क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से बोली, रे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।
देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपने अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुँए में धकेल दिया। देवयानी को कुँए में धकेल कर शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् राजा ययाति आखेट करते हुए वहाँ पर आ पहुँचे और अपनी प्यास बुझाने के लिए वे कुँएं क निकट गए तभी उन्होंने उस कुँए में वस्त्रहीन देवयानी को देखा।
जल्दी से उन्होंने देवयानी की देह को ढ़ँकने के लिए अपने वस्त्र दिए और उसको कुँए से बाहर निकाला। इस पर देवयानी ने प्रेमपूर्वक राजा ययाति से कहा, हे आर्य! आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूँ। हे क्षत्रिय श्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण पुत्री हूँ, किन्तु बृहस्पति के पुत्र कच के शाप के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिए आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिए। ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
देवयानी वहाँ से अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई तथा उनसे समस्त वृत्तांत कहा। शर्मिष्ठा के किए हुए कर्म पर शुक्राचार्य को अत्यन्त क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गए। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से मान-मनोवल करने लगे।
बड़ी मुश्किल से शुक्राचार्य का क्रोध शान्त हुआ और वे बोले, "हे दैत्यराज! मैं आपसे किसी प्रकार से रुष्ठ नहीं हूँ, किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं पुनः तुम्हारा साथ देने लगूँगा"।
वृषपर्वा ने देवयानी को प्रसन्न करने के लिए उससे कहा, "हे पुत्री! तुम जो कुछ भी माँगोगी मैं तुम्हें वह प्रदान करूँगा"। देवयानी बोली, "हे दैत्यराज! मुझे आपकी पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में चाहिए"। अपने परिवार पर आए संकट को टालने के लिए शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया।
शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। देवयानी के पुत्रवती होने पर शर्मिष्ठा ने भी पुत्र की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र यदु तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्यु, अनु तथा पुरु हुए।
बाद में जब देवयानी को ययाति तथा शर्मिष्ठा के संबंध के विषय में पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर कहा, रे ययाति! तू स्त्री लम्पट है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।
उनके शाप से भयभीत हो राजा ययाति गिड़गिड़ाते हुए बोले, हे दैत्य गुरु! आपकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुए अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है। तब कुछ विचार कर के शुक्रचार्य जी ने कहा, अच्छा! यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तुम उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो।
इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा, वत्स यदु! तुम अपने नाना के द्वारा दी गई मेरी इस वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था मुझे दे दो। इस पर यदु बोला, हे पिताजी! असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। इसलिये मैं आपकी वृद्धावस्था को नहीं ले सकता।
ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की माँग की, लेकिन सभी ने कन्नी काट ली। लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की माँग को स्वीकार कर लिया।
पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा, तूने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः मैं तुझे राज्याधिकार से वंचित करके अपना राज्य पुरु को देता हूँ। मैं तुझे शाप भी देता हूँ कि तुझ से चला वंश-संतति सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेगा।
शुक्राचार्य को श्रेष्ठ संगीतज्ञ और कवि होने का भी गौरव प्राप्त है। भागवत पुराण के अनुसार भृगु ऋषि के कवि नाम के पुत्र भी हुए जो कालान्तर में शुक्राचार्य नाम से प्रसिद्ध हुए। महाभारत के अनुसार शुक्राचार्य औषधियों, मन्त्रों तथा रसों के भी ज्ञाता हैं। इनकी सामर्थ्य अद्भुत है। इन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति अपने शिष्य असुरों को दे दी और स्वयं तपस्वी-जीवन ही स्वीकार किया।
शुक्राचार्य को भगवान् शिव ने निगल लिया तो कवि (शुक्राचार्य) ने भगवान् शिव की स्तुति प्रारंभ कर दी जिससे प्रसन्न हो कर भगवान् शिव ने उन को बाहर निकलने कि अनुमति दे दी। जब वे एक दिव्य वर्ष तक महादेव के उदर में ही विचरते रहे, लेकिन कोई छोर न मिलने पर वे पुनः भगवान् शिव स्तुति करने लगे। तब भगवान् शिव ने हंस कर कहा कि मेरे उदर में होने के कारण तुम मेरे पुत्र हो गए हो अतः मेरे शिश्न से बाहर आ जाओ। आज से समस्त चराचर जगत में तुम शुक्र के नाम से ही जाने जाओगे। शुक्रत्व पाकर भार्गव भगवान् शिव  के शिश्न से निकल आए। तब से कवि शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए।[वामन पुराण]
जब राजा बलि को सुतल लोक का राज बना दिया गया था तब शुक्राचार्य भी उनके साथ चले गए थे। शुक्राचार्य अपने पौत्र और्व के पास अरब में आ गए और दस वर्ष तक वहाँ रहे।
शुक्राचार्य के पौत्र का नाम और्व-अर्व या हर्ब था, जिसका अपभ्रंश होते होते अरब हो गया। 
अमंत्रं अक्षरं नास्ति, नास्ति मूलं अनौषधं।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ:॥
कोई अक्षर ऐसा नहीं है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरू होता हो, कोई ऐसा मूल (जड़) नहीं है, जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नहीं होता, उसको काम में लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।[शुक्र नीति]
    
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संतोष महादेव-सिद्ध व्यास पीठ, बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा

Friday, May 8, 2015

BHRAGU-BRAHMA JI'S SON :: ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु (ब्रह्मा 1)

ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
मरीचि मत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
प्रचेतसं  वशिष्ठन् च भृगुं नारदमेव च॥
मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु और नारद ये दस महर्षि  हैं।[मनु स्मृति 1.35]   
Marichi, Atri, Angira, Pulasty, Pulah, Kratu, Pracheta, Vashishth, Bhragu and Narad are 10 Mahrishi.
प्रचेता दक्ष प्रजापति के पिता थे। 
प्रचेता वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। प्रचेता का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्मा जी के पुत्र थे। बाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे।[मनुस्मृति]
बाल्मीकि के पिता का नाम वरुण और माँ का नाम चार्षणी था। वह अपने माता-पिता के दसवें पुत्र थे। उनके भाई ज्योतिषाचार्य भृगु ऋषि थे। महर्षि बाल्मीकि के पिता वरुण महर्षि कश्यप और अदिति के नौवीं सन्तान थे। वरुण का एक नाम प्रचेता भी है, इसलिए बाल्मीकि प्राचेतस नाम से भी विख्यात हैं। 
महर्षि भृगु अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। उनके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। जिनके पुत्र बृहस्पति हुए जो देवगणों के पुरोहित-देवगुरू के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि भृगु द्वारा रचित ज्योतिष ग्रंथ ‘भृगु संहिता’ के लोकार्पण एवं गंगा सरयू नदियों के संगम के अवसर पर जीवन दायिनी गँगा नदी के संरक्षण और याज्ञिक परम्परा से महर्षि भृगु ने अपने शिष्य दर्दर के सम्मान में ददरी मेला प्रारम्भ किया।
महर्षि भृगु की दो पत्नियों का उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलता है। इनकी पहली पत्नी दैत्यों के अधिपति हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या थी। जिनसे उनके दो पुत्र क्रमशः काव्य-शुक्र और त्वष्टा-विश्वकर्मा का जन्म हुआ। सुषानगर (ब्रह्मलोक) में पैदा हुए महर्षि भृगु के दोनों पुत्र विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बड़े पुत्र काव्य-शुक्र खगोल ज्योतिष, यज्ञ कर्म काण्डों के निष्णात विद्वान हुए। मातृकुल में उनको आचार्य की उपाधि मिली। ये जगत में शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए। दूसरे पुत्र त्वष्टा-विश्वकर्मा वास्तु के निपुण शिल्पकार हुए। मातृकुल दैत्यवंश में उनको ‘मय’ के नाम से जाना गया। अपनी पारंगत शिल्प दक्षता से ये भी जगद्ख्यात हुए।
महर्षि भृगु की दूसरी पत्नी दानवों के अधिपति पुलोम ऋषि की पुत्री पौलमी थी। इनसे भी दो पुत्रों च्यवन और ऋचीक पैदा हुए। बड़े पुत्र च्यवन का विवाह मुनिवर ने गुजरात भड़ौंच (खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा। आज भी भड़ौच में नर्मदा के तट पर भृगु मन्दिर बना है।
महर्षि भृगु ने अपने दूसरे पुत्र ऋचीक का विवाह कान्य कुब्ज पति कौशिक राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ एक हजार श्याम कर्ण घोड़े दहेज में देकर किया। अब भार्गव ऋचीक भी हिमालय के दक्षिण गाधिपुरी का एक क्षेत्र (वर्तमान बागी बलिया जिला (उप्र) आ गये।
महर्षि भृगु के इस विमुक्त क्षेत्र में आने के कई कथानक आर्ष ग्रन्थों में मिलते हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्मा-प्रचेता पुत्र भृगु द्वारा हिमालय के दक्षिण दैत्य, दानव और मानव जातियों के राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर मेलजोल बढ़ाने से हिमालय के उत्तर की देव, गन्धर्व, यक्ष जातियों के नृवंशों में आक्रोश पनप रहा था। जिससे सभी लोग देवों के संरक्षक, ब्रह्मा जी के सबसे छोटे भाई विष्णु को दोष दे रहे थे। दूसरे बारहों आदित्यों में भार्गवों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था। इसी बीच महर्षि भृगु के श्वसुर दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने हिमालय के उत्तर के राज्यों पर चढ़ाई कर दिया। जिससे महर्षि भृगु के परिवार में विवाद होने लगा। महर्षि भृगु यह कह कर कि राज्य सीमा का विस्तार करना राजा का धर्म है, अपने श्वसुर का पक्ष ले रहे थे। इस विवाद में भगवान् श्री हरी विष्णु ने उनकी पहली पत्नी, हिरण्य कश्यप की पुत्री दिव्या देवी को मार डाला। 
इस विवाद का निपटारा महर्षि भृगु के परदादा और विष्णु के दादा मरीचि मुनि ने इस निर्णय के साथ किया कि भृगु हिमालय के दक्षिण जाकर रहे। उनके दिव्या देवी से उत्पन्न पुत्रों को सम्मान सहित पालन-पोषण की जिम्मेदारी देवगण उठायेंगे। परिवार की प्रतिष्ठा-मर्यादा की रक्षा के लिए भृगु जी को यह भी आदेश मिला कि वह श्री हरि विष्णु की आलोचना नहीं करेंगे। इस प्रकार महर्षि भृगु सुषानगर से अपनी दूसरी पत्नी पौलमी को साथ लेकर अपने छोटे पुत्र ऋचीक के पास गाधिपुरी (वर्तमान बलिया) आ गये।
महर्षि भृगु के इस क्षेत्र में आने दूसरा आख्यान कुछ धार्मिक ग्रन्थों, पुराणों में मिलता है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कंध विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद्भागवत में खण्डों में बिखरे वर्णनों के अनुसार महर्षि भृगु प्रचेता-ब्रह्मा जी के पुत्र हैं, इनका विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री ख्याति से हुआ था। जिनसे इनके दो पुत्र काव्य-शुक्र और त्वष्टा तथा एक पुत्री ‘श्री’ लक्ष्मी का जन्म हुआ। इनकी पुत्री ‘श्री’ का विवाह भगवान् श्री हरि विष्णु से हुआ। दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति जो योग शक्ति सम्पन्न तेजस्वी महिला थी; ने दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को वह अपने योगबल से जीवित कर देती थी। जिससे नाराज होकर भगवान् श्री हरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता, भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। अपनी पत्नी की हत्या होने की जानकारी होने पर महर्षि भृगु ने भगवान् श्री हरी विष्णु को शाप दिया कि तुम्हें स्त्री के पेट से बार-बार जन्म लेना पड़ेगा। उसके बाद महर्षि अपनी पत्नी ख्याति को अपने योगबल से जीवित कर गँगा तट पर आ गये और तमसा नदी की सृष्टि की।
BHRAGU-BRAHMA JI'S SON :: ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु (ब्रह्मा 1)
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मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-शंकर) में श्रेष्ठ देव कौन है? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया।[पद्म पुराण, उपसंहार खण्ड]
त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान् शिव के कैलाश (हिन्दूकुश पर्वत श्रृंखला के पश्चिम कोह सुलेमान जिसे अब ‘कुराकुरम’ कहते हैं) पहुॅचे उस समय भगवान् शिव अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। इनके द्वारा भगवान् शिव से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान् शिव को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दिया।
यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्मलोक (सुषानगर, पर्शिया ईरान) ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहे। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्मा जी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षुभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।
भगवान् श्री हरि विष्णु क्षीर सागर (श्रीनार फारस की खाड़ी) में सर्पाकार सुन्दर नौका (शेषनाग) पर अपनी पत्नी लक्ष्मी-श्री के साथ विहार कर रहे थे। उस समय श्री विष्णु जी शयन कर रहे थे। महर्षि भृगु को लगा कि हमें आता देख विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। उन्होंने अपने दाहिने पैर का आघात भगवान् श्री हरी विष्णु की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर विष्णु प्रिया लक्ष्मी जो श्री हरि के चरण दबा रही थी, कुपित हो उठी। लेकिन भगवान् श्री हरी विष्णु ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन्! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। महर्षि भृगु लज्जित भी हुए और प्रसन्न भी, उन्होंने भगवान् श्री हरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ सतोगुणी घोषित कर दिया। 
त्रिदेवों की इस परीक्षा में जहाँ एक बहुत बड़ी सीख छिपी है। वहीं एक बहुत बड़ी कूटनीति भी छिपी थी। इस घटना से एक लोकोक्ति बनी।
क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का हरि को घट्यो गए, ज्यों भृगु मारि लात॥
इस घटना में कूटनीति यह थी कि हिमालय के उत्तर के नृवंशों का संगठन बनाकर रहने से श्री हरि विष्णु के नेतृत्व में सभी जातियां सभ्य, सुसंस्कृत बन उन्नति कर रही थी। वही हिमालय के दक्षिण का नृवंश समुदाय जिन्हें दैत्य-दानव, मरूत-रूद्र आदि नामों से जाना जाता था। परिश्रमी होने के बाद भी असंगठित, असभ्य जीवन जी रही थी। ये जातियां रूद्र शंकर को ही अपना नायक-देवता मानती थी। उनकी ही पूजा करती थी। हिमालय के दक्षिण में देवकुल नायक श्रीविष्णु को प्रतिष्ठापित करने के लिए महर्षि भृगु ही सबसे उपयुक्त माध्यम थे। उनकी एक पत्नी दैत्यकुल से थी, तो दूसरी दानव कुल से थी और उनके पुत्रों शुक्राचार्यों, त्वष्टा-मय-विश्वकर्मा तथा भृगुकच्छ (गुजरात) में च्यवन तथा गाधिपुरी (उ.प्र.) में ऋचीक का बहुत मान-सम्मान था। इस त्रिदेव परीक्षा के बाद हिमालय के दक्षिण में श्रीहरि विष्णु की प्रतिष्ठा स्थापित होने लगी। विशेष रूप से राजाओं के अभिषेक में श्री विष्णु का नाम लेना हिमालय पारस्य देवों की कृपा प्राप्ति और मान्यता मिलना माना जाने लगा। 
पुराणों में वर्णित आख्यान के अनुसार त्रिदेवों की परीक्षा में विष्णु वक्ष पर पद प्रहार करने वाले महर्षि भृगु को दण्डाचार्य मरीचि ऋषि ने पश्चाताप का निर्देश दिया। जिसके लिए भृगुजी को एक सूखे बाँस की छड़ी में कोंपले फूट पड़े और आपके कमर से मृगछाल पृथ्वी पर गिर पड़े। वही धरा सबसे पवित्र होगी वहीं आप विष्णु सहस्त्र नाम का जप करेंगे तब आपके इस पाप का मोचन होगा।
मन्दराचल से चलते हुए जब महर्षि भृगु विमुक्त क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला उप्र) के गंगा तट पर पहुँचे तो उनकी मृगछाल गिर पड़ी और छड़ी में कोंपले फूट पड़ी। जहाँ उन्होंने तपस्या करना प्रारम्भ कर दिया। कालान्तर में यह भू-भाग महर्षि के नाम से भृगुक्षेत्र कहा जाने लगा और वर्तमान में बागी बलिया (उप्र) (जो कि स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम आजाद जिला है) नाम से जाना जाता है।
महर्षि भृगु जीवन से जुड़े ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक सभी पक्षों पर प्रकाश डालने के पीछे मेरा सीधा मन्तव्य है कि पाठक स्वविवेक का प्रयोग कर सकें। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में हमारे मनीषियों के वर्णन तो प्रचुर है, परन्तु उसी प्रचुरता से उसमें कल्पित घटनाओं को भी जोड़ा गया है। उनके जीवन को महिमामण्डित करने के लिए हमारे पटुविद्वान उनकी ऐतिहासिकता से खिलवाड़ किए हैं, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर अनेक बार अपमानजनक स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
महर्षि भृगु ने इस भू-भाग पर (वर्तमान बलिया जिला(उप्र) आने के बाद यहाँ के जंगलों को साफ कराया। यहाँ मात्र पशुओं के आखेट पर जीवन यापन कर रहे जनसामान्य को खेती करना सिखाया। यहाँ गुरूकुल की स्थापना करके लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया। उस कालखण्ड में इस भू-भाग को नरभक्षी मानवों का निवास माना जाता था। उन्हें सभ्य, सुसंस्कृत मानव बनानें का कार्य महर्षि द्वारा किया गया।
भृगु संहिता :: महर्षि भृगु के परिवारिक जीवन से अपरिचित जन भी महर्षि द्वारा प्रणीत ज्योतिष-खगोल के महान ग्रंथ भृगु संहिता के बारे में जानते है। इस नाम से अनेक पुस्तके आज भी साहित्य विक्रेताओं के यहाॅ बिकती हुई दिखाई देती है।
महर्षि ने भृगु संहिता ग्रंथ की रचना अपनी दीर्घकालीन निवास की कर्म भूमि विमुक्त भूमि बलिया में ही किया था। इस सन्दर्भ दो बातें ध्यान देने की है। पहली बात यह है कि अपनी जन्मभूमि ब्रह्मलोक (सुषानगर) में निवास काल में उनका जीवन झंझावातों से भरा हुआ था। अपनी पत्नी दिव्या देवी की मृत्यु से व्यथित और त्रिदेवों की परीक्षा के उपरान्त जन्म भूमि से निष्कासित महर्षि को उसी समय शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर मिला जब वह विमुक्त भूमि में आये। भृगुकच्छ गुजरात में पहुॅचने के समय तक उनकी ख्याति चतुर्दिक फैल चुकी थी। क्योंकि उस समय तक उनके भृगु संहिता को भी प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनके शिष्य दर्दर द्वारा भृगुक्षेत्र में गँगा-सरयू के संगम कराने की बात भी पूरा आर्यवर्त जान चुका था। आख्यानों के अनुसार खम्भात की खाड़ी में महर्षि के पहुॅचने पर उनका राजसी अभिनन्दन किया गया था, तथा वैदिक विद्वान ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन करते हुए उन्हे आत्मज्ञानी ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित के रूप में उनकी अभ्यर्थना की थी। जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि महर्षि द्वारा भृगु संहिता की रचना सुषानगर से निष्कासन के बाद और गुजरात के भृगुकच्छ जाने से पहले की गई थी।
महर्षि की इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। इस ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति,शुक्र शनि आदि ग्रहों और नक्षत्रों पर आधारित वैदिक गणित के इस वैज्ञानिक ग्रंथ के माध्यम से जीवन और कृषि के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणियां की जाती थी।
महर्षि के कालखण्ड में कागज और छपाई की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऋचाओं को कंठस्थ कराया जाता था और इसकी व्यवहारिक जानकारी शलाकाओं के माध्यम से शिष्यों को दी जाती थी। कालान्तर में जब लिखने की विधा विकसित हुई और उसके संसाधन मसि भोजपत्र ताड़पत्र आदि का विकास हुआ, तब कुछ विद्वानों ने इन ऋचाओं को लिपिबद्ध करने का काम किया।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। 
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
महर्षियों में भृगु और वाणियों-शब्दों में एक अक्षर प्रणव मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञों में जप यज्ञ, स्थिर रहने वालों में हिमालय मैं हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 10.25]  
Bhagwan Shri Krashn said that HE is Bhragu amongest the great sages and ॐ-OM (monosyllable cosmic sound) amongest the words-speeches. Amongest the Yagy-ritualistic performances with sacrifices in Agni-fire, HE is Jap Yagy-spiritual recitation of Mantr-lyrics, rhythms and HE is Himalay mountain amongest the stationery-fixed objects.
परमात्मा ने भृगु, अत्रि और मरीचि आदि महृषियों में भृगु को अपनी विभूति इसलिये कहा है, क्योंकि उन्होंने ही परीक्षा करके बताया कि त्रिदेवों :- ब्रह्मा, विष्णु और महेश में, भगवान् विष्णु ही श्रेष्ठतम हैं। भगवान् विष्णु भृगु के चरण-चिन्हों को अपने वक्ष पर भृगुलता नाम से धारण किये हुए हैं। सबसे पहले तीन मात्रा वाला प्रणव प्रकट हुआ। तत्पश्चात त्रिपदा गायत्री और उससे वेद, वेदों से शास्त्र, पुराण आदि सम्पूर्ण वाङ्गमय जगत प्रकट हुआ। इसी प्रकार यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाओं को प्रणव के उच्चारण से ही प्रारम्भ किये जाने से परमात्मा शब्दों में प्रणव हैं। भगवन्नाम जप एक ऐसा यज्ञ है, जिसमें किसी पदार्थ या विधि-विधान की आवश्यकता नहीं है। अतः यह यज्ञों में, गलती-त्रुटि की गुंजाइश-संभावना न होने से श्रेष्ठतम और प्रभु की विभूति है। हिमालय पर्वत ऋषि-मुनियों की तप स्थली, पवित्र नदियों गँगा, यमुना का उद्गम, नर-नरायण की आदि स्थान बद्रीनाथ, केदारनाथ, कैलाश आदि का प्रमुख पवित्र स्थल होने से स्थिरों में प्रभु की विभूति है। 
Out of the Mahrishis born as the sons of Bhawan Brahma, Bhragu is entitled to be the supreme, since it was he who testified that Bhagwan Vishnu was superior amongest the Tri Dev :- Brahma, Vishnu & Mahesh. In this process he struck the chest of Bhagwan Vishnu with his foot, which was held by Bhagwan Shri Hari Vishnu and HE jokingly closed numerous eyes present in his foot granting him enlightenment & attracted curse of Maa Laxmi that his decedents would never have sufficient money to survive-subsistence. The Almighty recognise him as his Ultimate form as a sage. HE is wearing the marks of Bhragu's foot over his chest as Bhragu Lata. ॐ OM (primordial sound) is the syllable which appeared before evolution followed by Gayatri-divine prayer, which resulted into the appearance of Veds, Purans, scriptures, history etc. Therefore, the God is calling it to be HIS excellent character-quality, form. The recitation of the names of the God is free from procedure, methodology, sacrifices etc. Hence, it is considered to be the best form of prayer-worship, as there is rare-minimum chance of mistakes connected with sequence, offerings etc. Himalay-Everest is the place which is liked by the sages-ascetics to perform Yog, worship, prayers being isolates. Pious rivers like Ganga, Yamuna, Sahastr Dhara, appear here. Bhagwan Nar-Narayan are still practicing asceticism there, at Badri Nath. Bhagwan Shankar occupies Kaelash with Maa Parwati as his abode. Maa Bhagwati Parwati took incarnation as the daughter of Himalay. Gangotri & Yamunotri (Char Dhams) too are located here. It continues to supply water throughout the year into rivers like Saraswati, Brahm Putr etc. It results into rains in the entire northern region of India and controls the climate throughout the world. It is the highest mountain in the world. This is the reason the God is calling it his Supreme-Ultimate form.
वेद-पुराणों में भगवान् ब्रह्मा के मानस पुत्रों का वर्णन है। वे दिव्य सृष्टि के अंग थे। महाप्रलय, भगवान् ब्रह्मा जी के दिन-कल्प की शुरुआत में उनका उदय होता है। वेदों, पुराणों इतिहास को वे ही पुनः प्रकट करते हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु का श्रुतियों में विशेष स्थान है। उनके के बड़े भाई का नाम अंगिरा था। अत्रि, मरीचि, दक्ष, वशिष्ठ, पुलस्त्य, नारद, कर्दम, स्वायंभुव मनु, कृतु, पुलह, सनकादि ऋषि इनके भाई हैं। उन्हें भगवान् विष्णु के श्वसुर और भगवान् शिव के साढू के रूप में भी जाना जाता है। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षि मंडल में स्थान प्राप्त है। भृगु मुनि की पहली पत्नी दिव्या देवी के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप और उनकी पुत्री रेणुका के पति भगवान् विष्णु में वर्चस्व की जंग छिड गई। इस लडाई में महर्षि भृगु ने पत्न्नी के पिता दैत्यराज हिरण्य कश्यप का साथ दिया। क्रोधित भगवान् विष्णु जी ने सौतेली सास दिव्या देवी को मार डाला। 
AUTHOR OF ASTROLOGY-BHRAGU भृगुसंहिता के रचयिता-भृगु :: भृगु संहिता त्रिकाल अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों का समान रूप से प्रामाणिक ब्योरा देती है। भृगु संहिता महर्षि भृगु और उनके पुत्र शुक्राचार्य के बीच संपन्न हुए वार्तालाप के रूप में एक दुर्लभ ग्रंथ है। उसकी भाषा शैली गीता में भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के मध्य हुए संवाद जैसी है। हर बार आचार्य शुक्र एक ही सवाल पूछते हैं :- 
वद् नाथ दयासिंधो जन्मलग्नषुभाषुभम्। 
येन विज्ञानमात्रेण त्रिकालज्ञो भविष्यति॥ 
भार्गव वंश के मूल पुरुष महर्षि भृगु थे जिनको जन सामान्य ॠचाओं के रचिता, भृगुसंहिता के रचनाकार, यज्ञों में ब्रह्मा बनने वाले ब्राह्मण और त्रिदेवों की परीक्षा में भगवान् विष्णु की छाती पर लात मारने वाले मुनि के नाते जानता है। 
महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए, इनकी पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्य कश्यप की पुत्री दिव्या थी और दूसरी पत्नी दानवराज पुलोम की पुत्री पौलमी थी। पहली पत्नी दिव्या से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए, जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। भार्गवों में आगे चलकर आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। इन्हीं भृगु मुनि के पुत्रों को उनके मातृवंश अर्थात दैत्यकुल में शुक्र को काव्य एवं त्वष्टा को मय के नाम से जाना गया है। भृगु मुनि की दूसरी पत्नी पौलमी की तीन संताने हुईं। दो पुत्र च्यवन और ॠचीक तथा एक पुत्री हुई जिसका नाम रेणुका था। च्यवन ॠषि का विवाह शर्याति की पुत्री सुकन्या के साथ हुआ। ॠचीक का विवाह महर्षि भृगु ने राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दहेज में लेकर किया। पुत्री रेणुका का विवाह भृगु मुनि उस समय विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) के साथ किया।
मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में महर्षि भृगु को त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए निर्णायक चुना गया। भगवान् शिव की परीक्षा के लिए जब भृगु कैलाश पर्वत पर पहुँचे तो उस समय भगवान् शिव माता  पार्वती के साथ विहार कर रहे थे। शिव गणों ने महर्षि को उनसे मिलने नहीं दिया। महर्षि भृगु ने भगवान् शिव को तमोगुणी मानते हुए शाप दे दिया कि आज से आपके लिंग की ही पूजा होगी। भगवान् शिव आदि देव हैं। उन पर किसी के किसी भी श्राप का असर नहीं होता, अपितु श्राप देने वाला स्वयं ही मुसीबत में फँस जाता है। 
महर्षि भृगु अपने पिता भगवान् ब्रह्मा के ब्रह्म लोक पहुँचे। वहाँ इनके माता-पिता दोनों साथ बैठे थे। जिन्होंने सोचा पुत्र ही तो है, मिलने के लिए आया होगा। महर्षि का सत्कार नहीं हुआ। तब नाराज होकर इन्होंने भगवान् ब्रह्मा को रजोगुणी घोषित करते हुए शाप दिया कि आपकी कहीं  पूजा नही होगी। श्राप देने वाला व्यक्ति अपने सृजित पुण्य नष्ट कर लेता है। अतः कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो मनुष्य को किसी को भी कभी भी श्राप या बद्दुआ नहीं देनी चाहिए और ना ही किसी बुरा सोचना-करना चाहिये। श्राप को होनी-प्रारब्ध समझकर ग्रहण कर लेने से अपने संचित पुण्यकर्म मनुष्य की रक्षा करते हैं। 
क्रोध में  तमतमाए महर्षि भगवान् विष्णु के श्री धाम पहुँचे। वहाँ भगवान् श्री हरी विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में  थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थीं। क्रोधित महर्षि ने परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर पैर से प्रहार किया। भगवान् विष्णु ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और पूछा कि मेरे कठोर वक्ष से आपके पैर में चोट तो नहीं लगी। महर्षि  के पैर में तीसरी आँख थी जिससे उन्हें भविष्य का ज्ञान हो जाता था। भगवान् विष्णु उनकी इन्तजार कर ही रहे थे। उन्होंने मौके का फायदा उठाकर, उनकी तीसरी आँख मूँद दी। महर्षि  को इसका भान-आभास भी नहीं हुआ। परन्तु माँ लक्ष्मी ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके वंश में उत्पन्न ब्राह्मण दरिद्र ही रहें। देवी लक्ष्मी को भृगु का ऐसा करना नहीं भाया और उन्होंने ब्राह्मण समाज को श्राप दे दिया कि उनके वंश-खानदान में मेरा (लक्ष्मी का) वास नहीं होगा और वे दरिद्र बनकर इधर उधर भटकते रहेंगे।
महर्षि भृगु बोले के मैंने यह कार्य देवताओं के कहने पर त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिये किया था। मैंने इसकी माफ़ी भी मान ली है, पर आपने तो मेरे साथ साथ पूरे भार्गव वंश को श्राप दे दिया। अब जो होना था वो हो गया पर मैं अपने ब्राह्मण समाज के लिए ज्योतिष ग्रन्थ का निर्माण करूँगा और जिसके आधार पर वे समस्त प्राणियों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में बता सकेंगे और दक्षिणा के रूप में धन प्राप्त कर पाएँगे और मेरे ग्रन्थ के ज्ञाता किसी भी ब्राह्मण के घर में लक्ष्मी की कमी नहीं आएगी। 
भृगु की परीक्षा का आधार पर देवताओं ने देवों में भगवान् श्री हरी विष्णु को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर किया। यद्यपि आदि देव भगवान् महादेव ही इस ब्रह्माण्ड में सृष्टि के मूल हैं। भगवान् शिव की आयु 8 परार्ध, भगवान् ब्रह्मा की आयु 4 परार्ध और भगवान् विष्णु की आयु  परार्ध है। 
कुछ समय पश्चात् महर्षि भृगु ने ज्योतिष ग्रन्थ लिख दिया; परन्तु इसके पश्चात् भृगु को घमण्ड हो गया और वो भगवान् शिव के धाम में चले गए और घमण्ड में माता पार्वती से कहा कि मैंने ऐसा ग्रन्थ लिखा है जिससे किसी भी मनुष्य  का भूत, भविष्य और वर्तमान मालूम किया जा सकता है। माँ क्रोधित हो गयीं और उन्होंने भृगु को श्राप दे दिया कि तुम मेरे आवास में बिना अनुमति के अन्दर आ गए और अपनी विद्या पर इतना घमण्ड कर रहे हो। इसलिए तुम्हारी सारी  भविष्य वाणियाँ सच नहीं होगी। 
महर्षि के परीक्षा के इस ढ़ंग से नाराज मरीचि ॠषि ने इनको प्रायश्चित करने के लिए धर्मारण्य में तपस्या करके दोषमुक्त होने के लिए गँगा तट पर जाने का आदेश दिया। भृगु अपनी दूसरी पत्नी पौलमी को लेकर वहाँ आ गए। यहाँ पर उन्होने गुरुकुल स्थापित किया। उस समय यहाँ के लोग खेती करना नही जानते थे। महर्षि भृगु ने उनको खेती करने के लिए जंगल साफ़ कराकर खेती करना सिखाया। यहीं रहकर उन्होने ज्योतिष के महान ग्रन्थ भृगु संहिता की रचना की। कालान्तर में अपनी ज्योतिष गणना से जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि इस समय यहाँ प्रवाहित हो रही गँगा नदी का पानी कुछ समय बाद सूख जाएगा तब उन्होने अपने शिष्य दर्दर को भेज कर उस समय अयोध्या तक ही प्रवाहित हो रही सरयू नदी की धारा को वहाँ मंगाकर गंगा-सरयू का संगम कराया।
भृगु संहिता ज्योतिष का आदि ग्रंथ है अपार श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। 
महर्षि पराशर के ग्रंथ बृहत्पाराषरहोराषास्त्र में महर्षि भृगु को ही ज्योतिष शास्त्र का आदि प्रवर्तक कहा गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भृगु नामक एक प्रकांड ज्योतिषी हुए हैं। इस तरह भृगु ऐसे भविष्यवक्ता और त्रिकालज्ञ थे। 
भृगु संहिता में दृषेत शब्द बहुत बार आया है और संस्कृत के इस शब्द का अर्थ या प्रयोग देखने, दिखाई देने और दर्षित होने के संदर्भ में किया जाता है। इससे लगता है कि महर्षि भृगु को भूत और भविष्य स्पष्ट दिखाई देता था। इसमें पूर्वजन्म का विवरण भी है। एक जगह पर आचार्य शुक्र महर्षि भृगु से पूछते हैं :- 
पूर्वजन्मकृतं पापं कीदृक्चैव तपोबल। 
तद् वदस्य दयासिंधो येन भूयत्रिकालज्ञः॥ 
अधिकांष स्थलों पर पूर्वजन्म, वर्तमान जन्म तथा आने वाले जन्म का हाल भी दिया गया है। कुछ मामलों में यहांँ तक कहा गया है कि कोई व्यक्ति भृगु संहिता कब, कहाँ, किस प्रयोजन से विश्वास या अविश्वास के साथ सुनेगा। पत्नी की कुंडली के बिना ही सिर्फ पति की कुंडली के आधार पर पत्नी के बारे में व्यापक विवेचन व उसके सही होने की पुष्टि अनेक विद्वानों ने की है। भृगु संहिता में गणनाओं का उल्लेख करते समय वर्ष, महिने और दिन का भी जिक्र आता है। कुछ कुंडलियों में प्रश्नकाल के आधार भी पर गणनाएँ गईं हैं। कहीं-कहीं प्रश्नकर्ता के जन्म स्थान, निवास स्थान, पिता तथा उनके नामों के पहले अक्षरों का भी विवरण मिलता है। 
पितृव्यष्च सुखं पूर्ण नागत्रिंषतषत कवेः। 
सम्यक् ब्रूमि फलं तत्र पितृव्यष्च महतरम्॥
यह अनुमान लगाना असंभव है कि भृगु संहिता कितने पृष्ठों की है और इसका आकार क्या है। यह दुर्लभ ग्रंथ अरबों वर्ष पूर्व भोजपत्र पर लिखा गया था। प्राचीन अनमोल ग्रंथों को नालंदा विष्वविद्यालय में जला दिया गया था। अब भी कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें भृगु संहिता, षंख संहिता, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, रावण संहिता आदि सुरक्षित हैं। इनमें भृगु संहिता इतनी विशाल है कि उसे उठाना भी कठिन है।
भृगु संहिता नाम पर अनेकों प्रकाशकों ने पुस्तकें प्रकाशित की हैं जो कि अप्रमाणिक, अनुपयोगी हैं। 
भृगु की  तीन पत्नियाँ :- ख्या‍ति, दिव्या और पौलमी। पहली पत्नी का नाम ख्याति था, जो दक्ष कन्या थी। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता (काव्य शुक्र और त्वष्टा-विश्वकर्मा) तथा एक पुत्री श्री लक्ष्मी का जन्म हुआ। घटनाक्रम एवं नामों में कल्प-मन्वन्तरों के कारण अंतर आता है।[देवी भागवत के चतुर्थ स्कंध, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद् भागवत] लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान् विष्णु से कर दिया था।
आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। 
दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति, जो योगशक्ति संपन्न तेजस्वी महिला थीं, दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को जीवित कर देती थीं, जिससे नाराज होकर भगवान् श्री हरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता व महर्षि भृगु जी पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।
दूसरी पत्नी पौलमी :- उनके ऋचीक व च्यवन नामक दो पुत्र और रेणुका नामक पुत्री उत्पन्न हुई। भगवान् परशुराम महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ऋषि ऋचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे। रेणुका का विवाह विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) से किया।
जब महर्षि च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। इस घटना से दंस पौलमी को छोड़कर चला गया, तत्पश्चात पौलमी दुख से रोती हुई शिशु (च्यवन) को गोद में उठाकर पुन: आश्रम को लौटी। पौलमी के गर्भ से 5 और पुत्र बताए गए हैं।
भृगु पुत्र धाता के आयती नाम की स्त्री से प्राण, प्राण के धोतिमान और धोतिमान के वर्तमान नामक पुत्र हुए। विधाता के नीति नाम की स्त्री से मृकंड, मृकंड के मार्कण्डेय और उनसे वेद श्री नाम के पुत्र हुए। 
भृगु के और भी पुत्र थे जैसे उशना, च्यवन आदि। ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है। भार्गवों को अग्नि पूजक माना गया है। दाशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे।
शुक्राचार्य :- शुक्र के दो विवाह हुए थे। इनकी पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयंती थी, जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था और उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। दूसरी स्त्री का नाम गोधा (शर्मिष्ठा) था जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे।
च्यवन ऋषि :: शौनक जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले :- हे सूत कुमार! मुझे महर्षि भार्गव की कथा भी विस्तार से सुनाइए मैं उत्सुक हो रहा हूँ।
महर्षि शौनक का बारह वर्षीय सत्र वाला गुरुकुल उस नैमिषारण्य में चल रहा था।चारों ओर मेला सा लगा था, बड़ी चहल-पहल दिखाई देती थी। ब्राह्मणों, बटुकों सहित अत्यंत कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ऋषि गण वहाँ शिक्षा और तपस्या में लीन रहते थे। एक दिवस भ्रमण करते हुए लोमहर्षण के पुत्र सूतकुमार उग्रश्रवा का वहाँ पर आगमन हुआ। वह पुराणों के ज्ञाता थे तथा पुराणों की कथा कहने में कुशल भी। ऋषिगण उन्हें जानते थे। उन सब ने उग्रश्रवा जी को घेर लिया तथा कथा सुनाने का आग्रह करने लगे।
उग्रश्रवा जी ने ऋषियों का अभिवादन किया और हाथ जोड़कर बोले :- हे परम पूज्य ऋषिगण आप ही बताएँ कि आप सभी कौन सा प्रसंग सुनना चाहते हैं।
ऋषियों ने कहा :- हे कमलनयन सूत नंदन हम सब आपको देखकर आपसे बहुत सारे कथा प्रसंग सुनने के लिए अति उत्साहित हैं, परन्तु हमारे पूज्य कुलपति महर्षि शौनक जी अभी अग्नि की उपासना में तथा यज्ञादि कार्य में व्यस्त हैं, जैसे ही वे उपस्थित होते हैं, आप उनके कहने के अनुसार कथा सुनाइएगा। तत्पश्चात द्विजश्रेष्ठ विप्रशिरोमणि शौनक जी वैदिक स्तुतियों के कार्य का संपादन करके वहाँ पधारे और सुख पूर्वक विराजमान हो गए। शौनक जी ने कहा :- हे लोमहर्षण कुमार! मुझे मालूम है कि आप के प्रतापी पिता ने सब पुराणों आदि का भली प्रकार अध्ययन किया था, क्या आप भी उन सभी दिव्य कथाओं और राजर्षियों और ब्रह्मर्षियों के वंशो की कथावलियों के बारे में जानते हैं? यदि हाँ, तो कृपया सर्वप्रथम भृगुवंश का वर्णन करने वाली कथा कहिए।
हम सभी बहुत आतुरता के साथ आप के वचनों को सुनने के लिए उद्यत हैं।
सौतिपुत्र उग्रश्रवा ने कहा :- "मान्यवर मुझे मेरे पिता महर्षि वैशंपायन और महान श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कथा के रूप में जो कुछ भी सुनने को मिला है और जो कुछ भी मुझे ज्ञात है वह सब मैं आपको वर्णन करता हूँ"।
हे भृगुनंदन! मैं आपको सबसे पहले भृगुवंश का बखान करता हूं तथा आपके परम प्रतापी भार्गव वंश का भी परिचय देता हूँ। इस अद्भुत वृतांत को ध्यानपूर्वक सुनिए।
स्वयंभू ब्रह्मा जी ने वरुण के यज्ञ में महर्षि भृगु को अग्नि से उत्पन्न किया था। इनके अत्यंत गुणवान व प्रतापी पुत्र ऋषि च्यवन थे, जिन्हें भार्गव ऋषि भी कहते हैं। उनके पुत्र थे, धर्मात्मा प्रमति।
प्रमति और अप्सरा घृताची के गर्भ से रुरू का जन्म हुआ था और रुरु के पुत्र शनक थे, जो प्रमद्दरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। वह वेदों के पारंगत विद्वान और बड़े धर्मात्मा थे और आपके पिता भी।
शौनक जी बोले :- परन्तु  हे सूतपुत्र! मुझे पूरी कथा विस्तार से सुनने की उत्कंठा हो रही है मुझे बताइए कि महात्मा भार्गव का नाम च्यवन कैसे हुआ?
उग्रश्रवा जी ने ऋषिवर की तीव्र उत्कंठा भाँप ली और कहा :- "हे महात्मन! भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था, जो अत्यंत शीलवान और धर्मपरायणा पतिव्रता नारी थी"।
वह अपने पति को अत्यंत प्रिय थी तथा उसके गर्भ में महर्षि भृगु का पुत्र पल रहा था।
एक बार महर्षि भृगु ऋषि स्नान हेतु जैसे ही आश्रम से बाहर निकले, एक पुलोमा नाम का ही राक्षस उनके आश्रम में घुस गया।
इस राक्षस की भी एक कथा है :- बाल्यकाल में भृगु पत्नी पुलोमा रो रही थी तब उसके पिता ने उसे डराने के लिए उसका नाम उसी के घर में छुपे पुलोमा नाम के राक्षस के नाम पर रख दिया और कहा कि वह रोना बंद नहीं करेगी तो उसका विवाह राक्षस के साथ कर देंगे।
यह वही राक्षस था जो मौका देखकर भृगु के आश्रम में घुस गया था और उसने बाल्यावस्था में ही बालिका पुलोमा को मन ही मन में अपनी पत्नी के रूप में वरण कर लिया था ।
आश्रम में प्रवेश करते ही उस राक्षस की कुदृष्टि भृगु पत्नी पुलोमा पर पड़ी और वह कामदेव के वशीभूत होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
वह राक्षस भृगुपत्नी को अपनी पत्नी मानता था, सो उसे हरण करके ले जाना चाहता था। इसके लिए उसके मन में एक कुटिल योजना ने जन्म ले लिया। वैसे भी जब कोई गलत कार्य करने लगता है तो उसे सत्य ठहराने के लिए और औचित्य की खोज भी कर ही लेता है।
राक्षस पुलोमा ने भृगु के आश्रम में ही अग्निहोत्र में अग्निदेव को प्रज्वलित होते हुए देखा और भृगुपत्नी के समक्ष ही अग्निदेव से प्रश्न किया :- "हे अग्नि देवता ! सत्य की शपथ लेकर बताएँ, कि यह पहले से मेरी पत्नी है या नहीं"?
क्या इसके पिता ने भृगु के साथ विवाह के पूर्व ही मुझे विवाह हेतु नहीं सौंप दिया था?
मैंने तो इसे वर्षों पूर्व ही वरण कर लिया था। आप तो परम ज्ञानी और सत्य का साथ देने वाले देवता हैं। कृप्या सत्य का साथ दीजिए। अग्निदेव बहुत दु:खी हुए। क्योंकि सत्य कहना अत्यंत कठिन था और असत्य का साथ वह दे नहीं सकते थे।
अतः धीरे से उन्होंने कहा :- "हे दानवराज! यह सत्य है कि पुलोमा का वरण तुम्हीं ने पहले किया परंतु इसके पिता ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार करते हुए इसका विवाह भृगु के साथ ही किया है"।
पुलोमा अग्निदेव का वचन सुनकर बहुत दुखी हो गई कि इस दानव ने पहले ही उसका वरण किया था।
राक्षस ने इतना सुनकर भृगु पत्नी का अपहरण कर लिया।
उग्रश्रवा जी तनिक रुक कर बोले :- हे महात्मन! हे ऋषिवर! तब भृगु पत्नी के गर्भ में पल रहा वह बालक राक्षस के इस कुकृत्य से क्रोध में भर गया और माता के गर्भ से च्युत होकर बाहर निकल आया और उसने अपने अपूर्व तेज से राक्षस को भस्म कर दिया।
च्युत होकर बाहर निकले बालक का नाम इसीलिए च्यवन हुआ।
माता पुलोमा तब अपने पुत्र च्यवन को लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुँची और उसके आँसुओं की बाढ़ से नदी बन गई, जो वसुधरा कहलाई।
जैसे ही महर्षि भृगु को सब बातें पता चली तो अग्निदेव की कही बातों को सुनकर भृगु ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का श्राप दे दिया। बाद में ब्रह्मा जी ने अग्निदेव को श्राप से मुक्ति दी और कहा कि तुम्हारा सारा शरीर सर्वभक्षी नहीं होगा और केवल तुम्हारी ज्वालाएँ और चिताग्नि ही सर्वक्षण करेगी तथा यज्ञ कार्यों में आहुति के रूप में सभी देवताओं के भाग के रूप में तुम्हें हविष्य अवश्य प्राप्त होगा और तुम्हारे स्पर्श से सभी वस्तुएं शुद्ध हो जाएँगी।
हे महर्षि शौनक देव जी! यही भार्गव च्यवन ऋषि के जन्म का वृतांत है, उग्रश्रवा ने हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए कहा।
मुनिवर ने गुजरात के भड़ौंच (खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा।
सुकन्या से च्यवन को अप्नुवान नाम का पुत्र मिला। द‍धीच इन्हीं के भाई थे। इनका दूसरा नाम आत्मवान भी था। इनकी पत्नी नाहुषी से और्व का जन्म हुआ।[और्व कुल का वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में, ऋग्वेद में 8.10.2.4 पर, तैत्तरेय संहिता 7.1.8.1, पंच ब्राह्मण 21.10.6, विष्णुधर्म 1.32 तथा महाभारत अनुच्छेद 56 आदि में प्राप्त है]
ऋचीक :- पुराणों के अनुसार महर्षि ऋचीक, जिनका विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ हुआ था, के पुत्र जमदग्नि ऋषि हुए। जमदग्नि का विवाह अयोध्या की राजकुमारी रेणुका से हुआ जिनसे परशुराम का जन्म हुआ।
च्यवन ऋषि :: भृगु मुनि के पुत्र च्यवन महान तपस्वी थे। एक बार वे तप करने बैठे तो तप करते-करते उन्हें हजारों वर्ष व्यतीत हो गये। यहाँ तक कि उनके शरीर में दीमक-मिट्टी चढ़ गई और लता-पत्तों ने उनके शरीर को ढँक लिया। उन्हीं दिनों राजा शर्याति अपनी चार हजार रानियों और एकमात्र रूपवती पुत्री सुकन्या के साथ इस वन में आये। सुकन्या अपनी सहेलियों के साथ घूमते हुये दीमक-मिट्टी एवं लता-पत्तों से ढँके हुये तप करते च्यवन के पास पहुँच गई। उसने देखा कि दीमक-मिट्टी के टीले में दो गोल-गोल छिद्र दिखाई पड़ रहे हैं जो कि वास्तव में च्यवन ऋषि की आँखें थीं। सुकन्या ने कौतूहलवश उन छिद्रों में काँटे गड़ा दिये। काँटों के गड़ते ही उन छिद्रों से रुधिर बहने लगा। जिसे देखकर सुकन्या भयभीत हो चुपचाप वहाँ से चली गई।
आँखों में काँटे गड़ जाने के कारण च्यवन ऋषि अन्धे हो गये। अपने अन्धे हो जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने तत्काल शर्याति की सेना का मल-मूत्र रुक जाने का शाप दे दिया। राजा शर्याति ने इस घटना से अत्यन्त क्षुब्ध होकर पूछा कि क्या किसी ने च्यवन ऋषि को किसी प्रकार का कष्ट दिया है? उनके इस प्रकार पूछने पर सुकन्या ने सारी बातें अपने पिता को बता दी। राजा शर्याति ने तत्काल च्यवन ऋषि के पास पहुँच कर क्षमायाचना की। च्यवन ऋषि बोले कि राजन्! तुम्हारी कन्या ने भयंकर अपराध किया है। यदि तुम मेरे शाप से मुक्त होना चाहते हो तो तुम्हें अपनी कन्या का विवाह मेरे साथ करना होगा। इस प्रकार सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से हो गया।
सुकन्या अत्यन्त पतिव्रता थी। अन्धे च्यवन ऋषि की सेवा करते हुये अनेक वर्ष व्यतीत हो गये। हठात् एक दिन च्यवन ऋषि के आश्रम में दोनों अश्‍वनीकुमार आ पहुँचे। सुकन्या ने उनका यथोचित आदर-सत्कार एवं पूजन किया। अश्‍वनी कुमार बोले, "कल्याणी! हम देवताओं के वैद्य हैं। तुम्हारी सेवा से प्रसन्न होकर हम तुम्हारे पति की आँखों में पुनः दीप्ति प्रदान कर उन्हें यौवन भी प्रदान कर रहे हैं। तुम अपने पति को हमारे साथ सरोवर तक जाने के लिये कहो।" च्यवन ऋषि को साथ लेकर दोनों अश्‍वनीकुमारों ने सरोवर में डुबकी लगाई। डुबकी लगाकर निकलते ही च्यवन ऋषि की आँखें ठीक हो गईं और वे अश्‍वनी कुमार जैसे ही युवक बन गये। उनका रूप-रंग, आकृति आदि बिल्कुल अश्‍वनीकुमारों जैसा हो गया। उन्होंने सुकन्या से कहा कि देवि! तुम हममें से अपने पति को पहचान कर उसे अपने आश्रम ले जाओ। इस पर सुकन्या ने अपनी तेज बुद्धि और पातिव्रत धर्म से अपने पति को पहचान कर उनका हाथ पकड़ लिया। सुकन्या की तेज बुद्धि और पातिव्रत धर्म से अश्‍वनी कुमार अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन दोनों को आशीर्वाद देकर वहाँ से चले गये।
जब राजा शर्याति को च्यवन ऋषि की आँखें ठीक होने नये यौवन प्राप्त करने का समाचार मिला तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्होंने च्यवन ऋषि से मिलकर उनसे यज्ञ कराने की बात की। च्यवन ऋषि ने उन्हें यज्ञ की दीक्षा दी। उस यज्ञ में जब अश्‍वनीकुमारों को भाग दिया जाने लगा तब देवराज इन्द्र ने आपत्ति की कि अश्‍वनीकुमार देवताओं के चिकित्सक हैं, इसलिये उन्हें यज्ञ का भाग लेने की पात्रता नहीं है। किन्तु च्यवन ऋषि इन्द्र की बातों को अनसुना कर अश्‍वनी कुमारों को सोमरस देने लगे। इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने उन पर वज्र का प्रहार किया लेकिन ऋषि ने अपने तपोबल से वज्र को बीच में ही रोककर एक भयानक राक्षस उत्पन्न कर दिया। वह राक्षस इन्द्र को निगलने के लिये दौड़ पड़ा। इन्द्र ने भयभीत होकर अश्‍वनीकुमारों को यज्ञ का भाग देना स्वीकार कर लिया और च्यवन ऋषि ने उस राक्षस को भस्म करके इन्द्र को उसके कष्ट से मुक्ति दिला दी।
विश्वामित्र :- गाधि के एक विश्वविख्‍यात पुत्र हुए जिनका नाम विश्वामित्र था जिनकी गुरु वशिष्ठ से प्रतिद्वंद्विता थी। परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋचीक, पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वामित्र और भगवान् शंकर से प्राप्त हुई। च्यवन ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया।
मरीचि के पुत्र कश्यप की पत्नी अदिति से भी एक अन्य भृगु उत्त्पन्न हुए जो उनके ज्येष्ठ पुत्र थे। ये अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। इनके पुत्र बृहस्पति जी हुए, जो देवगणों के पुरोहित-देव गुरु के रूप में जाने जाते हैं।
भृगु ने ही भृगु संहिता, भृगु स्मृति, भृगु संहिता-ज्योतिष, भृगु संहिता-शिल्प, भृगु सूत्र, भृगु उपनिषद, भृगु गीता आदि की रचना की। 

Photoभृगु ने ही भृगु संहिता, भृगु स्मृति,  भृगु संहिता-ज्योतिष, भृगु संहिता-शिल्प, भृगु सूत्र, भृगु उपनिषद, भृगु गीता आदि की रचना की। 
भृगु संहिता त्रिकाल अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों का समान रूप से प्रामाणिक ब्योरा देती है। भृगु संहिता महर्षि भृगु और उनके पुत्र शुक्राचार्य के बीच संपन्न हुए वार्तालाप के रूप में एक दुर्लभ ग्रंथ है। उसकी भाषा शैली गीता में भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के मध्य हुए संवाद जैसी है। हर बार आचार्य शुक्र एक ही सवाल पूछते हैं :-
वद् नाथ दयासिंधो जन्मलग्नषुभाषुभम्।
येन विज्ञानमात्रेण त्रिकालज्ञो भविष्यति॥  
भार्गव वंश के मूल पुरुष महर्षि भृगु थे जिनको जन सामान्य ॠचाओं के रचिता, भृगुसंहिता के रचनाकार, यज्ञों में  ब्रह्मा बनने वाले ब्राह्मण और त्रिदेवों की परीक्षा में भगवान् विष्णु की छाती पर लात मारने वाले मुनि के नाते जानता है। महर्षि भृगु का जन्म प्रचेता ब्रह्म-दक्ष प्रजापति की पत्नी वीरणी के गर्भ से हुआ था। अपनी माता से सहोदर ये दो भाई थे। इनके बड़े भाई का नाम अंगिरा था। इनके पिता प्रचेता ब्रह्मा की दो पत्नियाँ थीं। 
महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए, इनकी पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्य कश्यप की पुत्री दिव्या थी और दूसरी पत्नी दानवराज पुलोम की पुत्री पौलमी थी। पहली पत्नी दिव्या से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए,जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। भार्गवों में आगे चलकर आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। इन्हीं भृगु मुनि के पुत्रों को उनके मातृवंश अर्थात दैत्यकुल में शुक्र को काव्य एवं त्वष्टा को मय के नाम से जाना गया है। भृगु मुनि की दूसरी पत्नी पौलमी की तीन संताने हुईं। दो पुत्र च्यवन और ॠचीक तथा एक पुत्री हुई जिसका नाम रेणुका था। च्यवन ॠषि का विवाह शर्याति की पुत्री सुकन्या के साथ हुआ। ॠचीक का विवाह महर्षि भृगु ने राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दहेज में लेकर किया। पुत्री रेणुका का विवाह भृगु मुनि उस समय विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) के साथ किया।
भृगु मुनि की पहली पत्नी दिव्या देवी के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप और उनकी पुत्री रेणुका के पति भगवान् विष्णु में वर्चस्व की जंग छिड गई। इस लडाई में  महर्षि भृगु ने पत्न्नी के पिता दैत्यराज हिरण्य कश्यप का साथ दिया। क्रोधित भगवान् विष्णु जी ने सौतेली सास दिव्या देवी को मार डाला। इस पारिवारिक झगड़े को आगे  बढ़ने से रोकने के लिए महर्षि भृगु के पितामह ॠषि मरीचि ने भृगु को नगर से बाहर चले जाने की सलाह दिया और वह धर्मारण्य में  आ गए।
मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में महर्षि भृगु को त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए निर्णायक चुना गया। भगवान् शिव की परीक्षा के लिए जब भृगु कैलाश पर्वत पर पहुँचे तो उस समय भगवान् शिव माता  पार्वती के साथ विहार कर रहे थे। शिव गणों ने महर्षि को उनसे मिलने नहीं दिया। महर्षि भृगु ने भगवान् शिव को तमोगुणी मानते हुए शाप दे दिया कि आज से आपके लिंग की ही पूजा होगी। भगवान् शिव आदि देव हैं। उन पर किसी के किसी भी श्राप का असर नहीं होता, अपितु श्राप देने वाला स्वयं ही मुसीबत में फँस जाता है।
महर्षि भृगु अपने पिता भगवान् ब्रह्मा के ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ इनके माता-पिता दोनों साथ बैठे थे। जिन्होंने सोचा पुत्र ही तो है, मिलने के लिए आया होगा। महर्षि का सत्कार नहीं हुआ। तब नाराज होकर इन्होंने भगवान् ब्रह्मा को रजो गुणी घोषित करते हुए शाप दिया कि आपकी कहीं पूजा नही होगी। 
श्राप देने वाला व्यक्ति अपने सृजित पुण्य नष्ट कर लेता है। अतः कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो मनुष्य को किसी को भी कभी भी श्राप या बद्दुआ नहीं देनी चाहिए और ना ही किसी बुरा सोचना-करना चाहिये। श्राप को होनी-प्रारब्ध समझकर ग्रहण कर लेने  और पलटकर श्राप देने से अपने संचित पुण्यकर्म मनुष्य की रक्षा करते हैं। 
क्रोध में  तमतमाए महर्षि भगवान् विष्णु के श्री धाम पहुँचे। वहाँ भगवान् श्री हरी विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में   थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थीं। क्रोधित महर्षि ने परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर पैर से प्रहार किया। भगवान् विष्णु ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और पूछा कि मेरे कठोर वक्ष से आपके पैर में चोट तो नहीं लगी। महर्षि  के पैर में तीसरी आँख थी जिससे उन्हें भविष्य का ज्ञान हो जाता था। भगवान् विष्णु उनकी इन्तजार कर ही रहे थे। उन्होंने मौके का फायदा उठाकर, उनकी तीसरी आँख मूँद दी। महर्षि  को इसका भान-आभास भी नहीं हुआ। परन्तु माँ लक्ष्मी ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनके वंश में उत्पन्न ब्राह्मण दरिद्र ही रहें। देवी लक्ष्मी को भृगु का  ऐसा करना नहीं भाया और उन्होंने ब्राह्मण समाज को श्राप दे दिया कि उनके वंश-खानदान में मेरा (लक्ष्मी का) वास नहीं होगा और वे दरिद्र बनकर इधर उधर भटकते रहेंगे।
महर्षि भृगु बोले के मैंने यह कार्य देवताओं के कहने पर त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिये किया था। मैंने इसकी माफ़ी भी मान ली है, पर आपने तो मेरे साथ साथ पूरे भार्गव वंश को श्राप दे दिया। अब जो होना था वो हो गया पर मैं अपने ब्राह्मण समाज के लिए ज्योतिष ग्रन्थ का निर्माण करूँगा और जिसके आधार पर वे समस्त प्राणियों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में बता सकेंगे और दक्षिणा के रूप में धन प्राप्त कर पाएँगे और मेरे ग्रन्थ के ज्ञात किसी भी ब्राह्मण के घर में लक्ष्मी की कमी नहीं आएगी। 
भृगु की परीक्षा का आधार पर देवताओं ने देवों में भगवान् श्री हरी विष्णु को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर किया। यद्यपि आदि देव भगवान् महादेव ही इस ब्रह्माण्ड में श्रष्टि के मूल हैं। भगवान् शिव की आयु 8 परार्ध तथा भवान ब्रह्मा और भगवान् विष्णु की आयु 2-2 परार्ध है। 
कुछ समय पश्च्यात महर्षि भृगु ने ज्योतिष ग्रन्थ लिख दिया परन्तु इसके पश्चात् भृगु को घमण्ड हो गया और वो भगवान् शिव के धाम में चले गए और घमण्ड में माता पार्वती से कहा कि मैंने ऐसा ग्रन्थ लिखा है जिससे किसी भी मनुष्य  का भूत, भविष्य और वर्तमान मालूम किया जा सकता है। माँ क्रोधित हो गयीं और उन्होंने भृगु को श्राप दे दिया कि तुम मेरे आवास में बिना अनुमति के अन्दर आ गए और अपनी विद्या पर इतना घमण्ड कर रहे हो। इसलिए तुम्हारी सारी  भविष्य वाणियाँ सच नहीं होगी।
महर्षि के परीक्षा के इस ढ़ंग से नाराज मरीचि ॠषि ने इनको प्रायश्चित करने के लिए धर्मारण्य में तपस्या करके दोषमुक्त होने के लिए गंगातट पर जाने का आदेश दिया। भृगु अपनी दूसरी पत्नी पौलमी को लेकर वहाँ आ गए। यहाँ पर उन्होने गुरुकुल स्थापित किया। उस समय यहाँ के लोग खेती करना नही जानते थे। महर्षि भृगु ने उनको खेती करने के लिए जंगल साफ़ कराकर खेती करना सिखाया। यहीं रहकर उन्होने ज्योतिष के महान ग्रन्थ भृगुसंहिता की रचना की। कालान्तर में अपनी ज्योतिष गणना से जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि इस समय यहाँ प्रवाहित हो रही गँगा नदी का पानी कुछ समय बाद सूख जाएगा तब उन्होने अपने शिष्य दर्दर को भेज कर उस समय अयोध्या तक ही प्रवाहित हो रही सरयू नदी की धारा को वहाँ मंगाकर गंगा-सरयू का संगम कराया।
भृगु संहिता ज्योतिष का आदि ग्रंथ है अपार श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। 
महर्षि पराशर के ग्रंथ बृहत्पाराषरहोराषास्त्र में महर्षि भृगु को ही ज्योतिष शास्त्र का आदि प्रवर्तक कहा  गया है।इससे स्पष्ट हो जाता है कि भृगु नामक एक प्रकांड ज्योतिषी हुए हैं। इस तरह भृगु ऐसे भविष्यवक्ता और त्रिकालज्ञ थे।
भृगु संहिता में दृषेत शब्द बहुत बार आया है और संस्कृत के इस शब्द का अर्थ या प्रयोग देखने, दिखाई देने और दर्षित होने के संदर्भ में किया जाता है। इससे लगता है कि महर्षि भृगु को भूत और भविष्य स्पष्ट दिखाई देता था। इसमें पूर्वजन्म का विवरण भी है। एक जगह पर आचार्य शुक्र महर्षि भृगु से पूछते हैं :- 
पूर्वजन्मकृतं पापं कीदृक्चैव तपोबल। 
तद् वदस्य दयासिंधो येन भूयत्रिकालज्ञः॥ 
अधिकांष स्थलों पर पूर्वजन्म, वर्तमान जन्म तथा आने वाले जन्म का हाल भी दिया गया है। कुछ मामलों में यहांँ तक कहा गया है कि कोई व्यक्ति भृगु संहिता कब, कहाँ, किस प्रयोजन से विश्वास या अविश्वास के साथ सुनेगा। पत्नी की कुंडली के बिना ही सिर्फ पति की कुंडली के आधार पर पत्नी के बारे में व्यापक विवेचन व उसके सही होने की पुष्टि अनेक विद्वानों ने की है। भृगु संहिता में गणनाओं का उल्लेख करते समय वर्ष, महिने और दिन का भी जिक्र आता है। कुछ कुंडलियों में प्रश्नकाल के आधार भी पर गणनाएँ गईं हैं। कहीं-कहीं प्रश्नकर्ता के जन्म स्थान, निवास स्थान, पिता तथा उनके नामों के पहले अक्षरों का भी विवरण मिलता है।
पितृव्यष्च सुखं पूर्ण नागत्रिंषतषत कवेः। 
सम्यक् ब्रूमि फलं तत्र पितृव्यष्च महतरम्॥ 
यह अनुमान लगाना असंभव है कि भृगु संहिता कितने पृष्ठों की है और इसका आकार क्या है। यह दुर्लभ ग्रंथ अरबों वर्ष पूर्व भोजपत्र पर लिखा गया था। प्राचीन अनमोल ग्रंथों को नालंदा विष्वविद्यालय में जला दिया गया था। अब भी कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं जिनमें भृगु संहिता, षंख संहिता, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, रावण संहिता आदि सुरक्षित हैं। इनमें भृगु संहिता इतनी विशाल है कि उसे उठाना भी कठिन है।
भृगु संहिता नाम पर अनेकों प्रकाशकों ने पुस्तकें प्रकाशित की हैं जो कि अप्रमाणिक, अनुपयोगी हैं। 
There are several names which are significant in astrology like Dev Rishi Narad, Ravan, Samudr (Ocean) and Bhagwan Kartikey. Almost all sages-saints of the status of Bhawan were blessed with insight, intuition and peep into future.


 
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