Thursday, December 5, 2019

GURU GOVIND SINGH & KHALSA PANTH गुरु गोबिन्द सिंह-खालसा पंथ

गुरु गोबिन्द सिंह
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
गुरू ग्रंथ साहिब में 11 ब्राह्मणों ने अपनी वाणी दी है जिसे गुरु ग्रंथ साहिब में भट्ट वाणी के नाम से जाना जाता है। (1). भट्ट जालप, (2). भट्ट कलेशर, (3). भट्ट शल, (4). भट्ट नल, (5). भट्ट मथुरा, (6). भट्ट भल्ल, (7) भट्ट कीरत, (8). भट्ट बल्ह, (9). भट्ट हरिवंश, (10). भट्ट गयानंद और (11). भट्ट भीखा।
खालसा पंथ में हिंदुओं का योगदान :: आम कहना हैं की सिखों ने हिंदुओं की रक्षा की। खालसा पन्थ की स्थापना के समय ब्राह्मण, हिन्दू खत्री आगे आये। हर हिन्दु ने अपने परिवार का बड़ा बेटा खालसा फौज के लिए दिया था। एक और जहाँ मराठे लड़ रहे थे वहीं दूसरी और राजपूतों और ब्राह्मणों ने मुगलों की नाक में दम किया हुआ था। जब पहली खालसा फ़ौज बनी तब उसका नेतृत्व एक ब्राह्मण भाई प्राग दास जी के हाथ में था। उसके बाद उनके बेटे भाई मोहन दास जी ने कमान सम्भाली। सती दास जी, मति दास जी, दयाल दास जी जैसे वीर शहीद ब्राह्मण खालसा फ़ौज के सेनानायक थे। इन्होंने गुरु जी की रक्षा करते हुए अपनी जान दी। गुरु गोबिंद जी को शस्त्रों की शिक्षा देने वाले पण्डित कृपा दत्त जी भी एक ब्राह्मण थे, उनसे बड़ा योद्धा कभी पंजाब के इतिहास में नही देखा गया। जब 40 मुक्ते मैदान छोड़ कर भागे तब एक बैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास भरद्वाज उर्फ़ बन्दा बहादुर और उनका 14 साल का पुत्र अजय भरद्वाज गुरु जी के परिवार की रक्षा के लिए सरहिंद में लड़े। चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में उनकी इतिहासिक विजय हुई। 
1,906 में खालसा पन्थ सिख धर्म बना। अकाली लहर चला कर उसे हिन्दु धर्म से कुछ लोगों ने अलग कर दिया। इतिहास से छेड़-छाड़ हुई पर सच्चाई कभी बदल नही सकती। अंगेजों ने DIVID & RULE के तहत सिख गुरुद्वारा समिति आदि की स्थापना कराई। 1,946 तक पण्डित इन परिवारों में पूर्वत विवाह आदि संस्कार कराते रहे मगर बाद में राजनैतिक लाभों के दृष्टिगत कुछ लोगों ने ताना-बाना ध्वस्त कर दिया और बाद में खालिस्तान जैसे आन्दोलन खड़े कर दिये जिनका संचालन मुख्यतया कैनेडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों से भारत और सनातन धर्म के प्रति विरोध और दुर्भावना से किया जा रहा है। इसमें पाकिस्तान का खुला हाथ है। 
गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म :- 22 दिसम्बर 1,666) सिखों के दसवें गुरु थे। उनके पिता गुरु तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त 11 नवम्बर सन 1,675 को वे 
गुरु बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन 1,699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पन्थ की स्थापना की।
Nanak Dev was in a Hindu Vaeshy family. His successors from Guru Govind Singh to Guru Tegh Bahadur were also Hindus.
Govind Singh a Kayasth & 10th Guru. Between 40-45 years of age he laid the foundation of Sikhism to fight against the tyranny of Mughals.
If we tell the Sikhs that their Gurus were also Hindus, most of them do not believe it. When we ask them why Baba Nanak use suffix as Dev and same is the case with their other 8 Gurus except Guru Govind Singh.
The Hindus gave their eldest son to fight with the Mughals. Later on it became a tradition, all the male children became Sikhs.
गुरु गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरु गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।
उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाड़ियों के राजा) के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें सर्वस्व दानी भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जन साधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
गुरु गोविंद सिंह जहाँ विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में 52 कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें संत सिपाही भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।
उन्होंने सदा प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। किसी ने उनका अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। उनकी मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं "भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन"। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है।
गुरु गोविंद सिंह का जन्म नौवें सिख (शिष्य) गुरु तेगबहादुर और माता गुजरी के घर पटना में 22 दिसम्बर 1,666 को हुआ था। जब वह पैदा हुए थे उस समय उनके पिता असम में धर्म उपदेश को गये थे। उनके बचपन का नाम गोविन्द राय (राय कायस्थों की उपशाखा है) था। पटना में जिस घर में उनका जन्म हुआ था और जिसमें उन्होने अपने प्रथम चार वर्ष बिताये थे, वहीं पर अब तखत श्री पटना साहिब स्थित है।
1,670 में उनका परिवार फिर पंजाब आ गया। मार्च 1,672 में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर आ गया। यहीं पर इनकी शिक्षा आरम्भ हुई। उन्होंने फारसी, संस्कृत की शिक्षा ली और एक योद्धा बनने के लिए सैन्य कौशल सीखा। चक नानकी ही आजकल आनन्दपुर साहिब कहलता है।
गोविन्द राय जी नित्य प्रति आनंदपुर साहब में आध्यात्मिक आनंद बाँटते, मानव मात्र में नैतिकता, निडरता तथा आध्यात्मिक जागृति का संदेश देते थे। आनंदपुर वस्तुतः आनंदधाम ही था। यहाँ पर सभी लोग वर्ण, रंग, जाति, संप्रदाय के भेदभाव के बिना समता, समानता एवं समरसता का अलौकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। गोविन्द जी शांति, क्षमा, सहनशीलता की मूर्ति थे।
कश्मीरी पण्डितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाये जाने के विरुद्ध शिकायत को लेकर तथा स्वयं इस्लाम न स्वीकारने के कारण 11 नवम्बर 1,675 को औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया। इसके पश्चात वैशाखी के दिन 29 मार्च 1,676 को गोविन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए।
10वें गुरु बनने के बाद भी आपकी शिक्षा जारी रही। शिक्षा के अन्तर्गत लिखना-पढ़ना, घुड़सवारी तथा धनुष चलाना आदि सम्मिलित था। 1,684 में उन्होने चंडी दीवार की रचना की। 1685 तक आप यमुना नदी के किनारे पांवटा नामक स्थान पर रहे।
गुरु गोबिन्द सिंह की तीन पत्नियाँ थीं। 21जून, 1,677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे :- जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत प्रभावशाली रहा।
अप्रैल 1,685 में, सिरमौर के राजा मत प्रकाश के निमंत्रण पर गुरू गोबिंद सिंह ने अपने निवास को सिरमौर राज्य के पांवटा शहर में स्थानांतरित कर दिया। सिरमौर राज्य के गजट के अनुसार, राजा भीम चंद के साथ मतभेद के कारण उनजी को आनंदपुर साहिब छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और वे वहाँ से टोका शहर चले गये। मत प्रकाश ने उनको टोका से सिरमौर की राजधानी नाहन के लिए आमंत्रित किया। नाहन से वह पांवटा के लिए रवाना हुए। मत प्रकाश ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से उनको अपने राज्य में आमंत्रित किया था। राजा मत प्रकाश के अनुरोध पर उन्होंने पांवटा में बहूत कम समय में उनके अनुयायियों की मदद से एक किले का निर्माण करवाया। गुरु जी पांवटा में लगभग तीन साल के लिए रहे और कई ग्रंथों की रचना की। 
सन 1,687 में नादौन की लड़ाई में, गुरु गोबिंद सिंह, भीम चंद और अन्य मित्र देशों की पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने अलिफ़ खान और उनके सहयोगियों की सेनाओं को हरा दिया था। विचित्र नाटक (गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथा) और भट्ट वाहिस के अनुसार, नादौन पर बने व्यास नदी के तट पर गुरु गोबिंद सिंह आठ दिनों तक रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण सैन्य प्रमुखों का दौरा किया।
भंगानी के युद्ध के कुछ दिन बाद, रानी चंपा (बिलासपुर की विधवा रानी) ने गुरु जी से आनंदपुर साहिब (या चक नानकी जो उस समय कहा जाता था) वापस लौटने का अनुरोध किया जिसे गुरु जी ने स्वीकार किया। वह नवंबर 1,688 में वापस आनंदपुर साहिब पहुँच गये।
1,695 में, दिलावर खान (लाहौर का मुगल मुख्य) ने अपने बेटे हुसैन खान को आनंदपुर साहिब पर हमला करने के लिए भेजा। मुगल सेना हार गई और हुसैन खान मारा गया। हुसैन की मृत्यु के बाद, दिलावर खान ने अपने आदमियों जुझार हाडा और चंदेल राय को शिवालिक भेज दिया। हालांकि, वे जसवाल के गज सिंह से हार गए थे। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम औरंगज़ेब लिए चिंता का कारण बन गए और उसने क्षेत्र में मुगल अधिकार बहाल करने के लिए सेना को अपने बेटे के साथ भेजा।
खालसा पंथ की स्थापना में ब्राह्मणों का बहुत भारी योगदान था। उस वक्त पंजाब हर ब्राह्मण परिवार का बड़ा बेटा फौज में भर्ती करा दिया जाता था-सिख (शिष्य) बना दिया जाता था। मराठों के साथ-साथ ब्राह्मणों की फौज (खालसा पन्थियों) ने भी मुगलों की नाक में दम कर रखा था। पहली खालसा फौज का नेतृत्व भाई प्राग दास जी हाथ में था जो कि स्वयं ब्राह्मण थे। उनके बाद उनके पुत्र भाई मोहन दास ने कमान संभाली। सती दास, मती दास, दयाल दास आदि ब्राह्मण खालसा पंथ की फौज के नायक थे। इन्होने गोविन्द सिंह की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये थे। पण्डित कृपा दत्त ने गोविन्द सिंह को अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी। उस वक्त पंजाब में उनसे बड़ा योद्धा कोई नहीं था। जब चालीस मुक्ते मैदान छोड़कर भागे, तब वैरागी ब्राह्मण लक्ष्मण दास जी (बँदा बहादुर) और उनके 14 साल के पुत्र अजय भारद्वाज ने सरहिंद में गोविन्द सिंह के परिवार की रक्षा की और चप्पड़ चिड़ी की लड़ाई में ऐतिहासिक विजय हासिल की। 1,906 में अंग्रेजों की शह पर अकालियों ने खालसा पंथ को सिख धर्म में तब्दील कर दिया। अंग्रेजों के इशारे पर ही गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की स्थापना हुई। मेरे अध्यापक डॉक्टर एन. के. दत्त ने बताया कि आजादी से पहले स्वर्ण मन्दिर परिसर में विवाह आदि शुभ कार्य ब्राह्मण परिवार ही कराया करते थे। मेरे अध्यापक (Prof. Dr. N.K. Dutt, CIE-Education Faculty, Delhi University Ex. VC Banaras Hindu University)) जो स्वयं ब्राह्मण थे, के बड़े भाई एक सिख थे, जैसा कि उन्होंने स्वयं कक्षा में बताया था। गुरु गोविन्द सिंह की नान्देड़ में हत्या के समय उनकी फौज में सिपहसलार-सेना नायक, वशिष्ट ब्राह्मण परिवार, बाद में लौटकर जेवर (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश) के नजदीक 9 गाँवों (मंगरौली, अलावल पुर, सोबोता, बनवारीपुर, थोरे आदि; इन सभी गाँवों की जमीन अब जेवर हवाई अड्डे के लिए अधिग्रहण कर ली गई है) में आकर बस गये। मेरी माँ इन्द्रपुरी-नई दिल्ली के गुरूद्वारे मेरे द्वारा में नियमित रूप से मेरे द्वारा सीधा (भेंट, भोजन सामग्री) भिजवाती थीं। मेरे नाना पण्डित बिहारी लाल, गॉंव मँगरौली, अपने जमाने के बहुत जाने माने और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वो हमेशां मुंडासा-पगड़ी पहनते थे। उनके बाद उनके पुत्र-मेरे मामा पण्डित घासी राम का बहुत दबदबा था। उनके नाम से कहावत बहुत मशहूर है "मॉल मारे घासी दंड भुगते हुलासी"। इन्द्रा गाँधी (जी कि हकीकत में जो एक मुसलमान थी) और उनका परिवार भी उन्हें मान्यता देता था। 
गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1,699 में बैसाखी के दिन दास जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है, का निर्माण किया।
सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा :- "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगी तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बाहर निकले तो खून से सनी तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पाँचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया।
उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पाँच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा :- केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा-कच्छा।
27 दिसम्बर सन्‌ 1,704 को उनके दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावत सिंह व फतेह सिंह को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरु जी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है।
8 मई सन्‌ 1,705 में मुक्तसर में मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें उनकी जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1,706 में वो दक्षिण में गए जहाँ उन्हें औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए।
औरंगजेब की मृत्यु के बाद उन्होंने बहादुर शाह जफ़र को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुर शाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान उनके पीछे लगा दिए। इन पठानों ने उन पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1,708 में गोबिन्द सिंह नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय में उन्होंने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास (लक्ष्मण दस) ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी।

    
Contents of these above mentioned blogs are covered under copyright and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS ARE RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Wednesday, June 26, 2019

XXX MARRIAGE OF BHAGWAN SHIV & MAA PARWATI शिव पार्वती विवाह

MARRIAGE OF BHAGWAN SHIV & MAA PARWATI
शिव पार्वती विवाह
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com   santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com
(1). गृहस्थ-दाम्पत्य जीवन :: भगवान् शिव योगेश्वर हैं,  वैरागी है और गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे है। उनके हाथ में त्रिशूल है जो तीन शूल काम, क्रोध, लोभ का प्रतीक है।गृहस्थ में प्रवेश करने से पहले तीनों ही अधीन-वश में हैं। नंदीश्वर पर बैठकर चले हैं, जो कि स्वयं धर्म हैं। अर्थात धर्म किसी भी परिस्थिति में नहीं छोडेगे। उनके भाल पर चंद्रमा सुशोभित है, जो कि मन का प्रतीक है। मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त और  उज्जवल हो। सिर पर जटाओ का मुकुट है, गृहस्थ में प्रवेश करने जा रहे हैं और गृहस्थी में जंजाल भी बहुत होते हैं। उन जंजाल रूपी जटाओ को, संकट को भी श्रंगार मुकुट बनाकर धारण किया है-स्वीकार किया है। 
जटाओं से गंगा की धारा बह रही है, अर्थात गृहस्थी के सिर पर जो जंजालो की जटाए हैं। उनसे विवेक की, भक्ति की, गंगा निकलती है। नागों के आभूषण पहन रखे हैं जो कि इस बात के प्रतीक हैं कि विषैले व्यक्ति भी नियन्त्रण में रहें। 
मुंडमाला इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है। भस्म रमाके चले है। भस्म काम नाशक है। विवाह में हल्दी लगायी जाती है, जो कि कामवर्द्धक, परन्तु रोगनाशक भी है। 
शिव के शरीर पर व्याघ्र  चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर, उसे अपने नीचे दबा कर चले हैं। गृहस्थ में हिंसा और अहंकार दोनों के लिये ही स्थान  नहीं है। स्थान है तो केवल समन्वय-सामंजस्य का। 
गृहस्थ में समन्वय आवश्यक है। जहाँ पत्नी, पुत्र और वाहन सभी की पूजा होती है। माँ पार्वती भवानी है, पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं, वाहन नंदी हैं। यहाँ सभी आदरणीय और पूजनीय हैं।पूरा शिव परिवार ही आदरणीय-पूजनीय है। 
गले में सर्प हैं।उनकी भी पूजा होती है। अर्थात अपने चरित्र को ऐसा बनाये कि सभी आदर करे। कार्तिकेय का वाहन मोर है, गणेश जी का वाहन चूहा है, माता का वाहन शेर है। मोर सर्प को खाता है। सर्प चूहे को खा जाता है। सिंह, बैल को खाता है। पर यहाँ सभी साथ-साथ प्यार से रहते हैं। यही समन्वय गृहस्थ जीवन-परिवार में होना चाहिये। 
भगवान् शिव और माँ पार्वती राम चरित्र की चर्चा करते हैं। भगवान् शिव जी ने ही माँ पार्वती जी को श्री राम कथा सुनाई। पति-पत्नी में संत्संग और राम चर्चा भी हो सकती है। श्रीमद्भागवत में देवहुति और कर्दम जी के गृहस्थ जीवन में प्रवेश होने पर 14 वर्षों तक दोनों पति पत्नी के बीच में केवल सत्संग ही हुआ तत्पश्चात गृहस्थ में प्रवेश किया। इसलिए भगवान कपिल के रूप में उनके यहाँ अवतरित हुए। 
माता सती के वियोग के उपरान्त भगवान् शंकर तपस्या में लीन हो गए। माँ सती ने शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं पुनः जन्म लेकर हिमवान-हिमालय के यहाँ जन्म लेकर भगवान् शंकर की अर्द्धांगिनी बनुँगी। देवताओं की योजनानुसार माता हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ में प्रविष्ट होकर उनकी कोख से प्रकट हुईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण माँ भगवती जगदम्बा पार्वती कहलाईं। उनके सयानी होने पर  सयानी माता-पिता को उनके योग्य वर की चिंता सताने लगी।
विधि के अनुसार एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और माँ पार्वती का हाथ देखकर कहने लगे कि उनका विवाह भगवान् शंकर के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से उनके योग्य हैं। पार्वती के माता-पिता को नारद ने जब यह बताया कि पार्वती साक्षात जगदम्बा के रुप में इस जन्म में आपके यहा प्रकट हुई हैं तो उन्हें अपार आनन्द हुआ।
तपस्या से उपरति के पश्चात भगवान् शिव घूमते-घुमाते हिमालय प्रदेश में जा पहुँचे। माँ को तपस्या करते हुए पाया तो उन्होंने माँ की परीक्षा ली और संतुष्ट हुए। माँ भी उनको पाने के लिए अनवरत तपस्या में लीं थीं। भोले बाबा नट का रूप धारण करके हिमालय के यहाँ पहुँचे और भाँति-भाँति के करतव दिखाने लगे। पर्वतराज की पत्नी मैना ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप धारण करने को कहा तो प्रभु तत्काल इन तीनों ही रूपों में प्रकट हो गए। अन्ततोगत्वा हिमालय और उनकी पत्नी मैना भगवान् शिव से उनकी पुत्री को पत्नी के रूप में ग्रहण करने की प्रार्थना की। भगवान् शिव माँ पार्वती की भक्ति देखकर वे उनका आग्रह नहीं टाल पाये। भगवान् शिव से अनुमति मिलने के बाद माँ पार्वती प्रतिदिन अपनी सखियों को साथ ले भोले बाबा की सेवा करने लगीं। माँ पार्वती इस बात का सदा ध्यान रखती थीं कि भगवान् शिव को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। माता पार्वती प्रतिदिन भगवान् शिव के चरण धोकर चरणोदक ग्रहण करतीं और षोडशोपचार से पूजा करतीं। इसी तरह माँ पार्वती को भगवान शंकर की सेवा करते दीर्घ समय व्यतीत हो गया। किन्तु पार्वती जैसी सुंदर बाला से इस प्रकार एकांत में सेवा लाभ लेते रहने पर भी भगवान शंकर के मन में कभी विकार  उत्पन्न नहीं हुआ।
त्रिपुरारी शिव हमेशा अपनी समाधि में ही निश्चल रहते। उधर देवताओं को तारक नाम का असुर बड़ा त्रास दे रहा था। ब्रह्मा जी ने उस सभी देवता को बताया, इस दैत्य की मृत्यु केवल शिव जी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र के हाथों ही हो सकती हैं। सभी देवता शिव-पार्वती का विवाह कराने का प्रयास करने लगे। देवताओं ने शिव को पार्वती के प्रति अनुरक्त करने के लिए कामदेव को उनके पास भेजा, किन्तु पुष्पायुध का पुष्पबाण भी शंकर के मन को विक्षुब्ध न कर सका। उलटा कामदेव भगवान् शिव की क्रोधाग्नि से भस्म हो गए।
तदोपरांत भगवान्  शिव कैलास की ओर चल दिए। माँ पार्वती को भगवान् शंकर की सेवा से वंचित होने का बड़ा दुःख हुआ, किंतु उन्होंने निराश न होकर अब की बार तप द्वारा शंकर को संतुष्ट करने की मन में ठानी।
उनकी माता ने उन्हें सुकुमार एवं तप के अयोग्य समझकर बहुत मना किया, किन्तु पार्वती पर इसका कोई असर नहीं हुआ। पार्वती अपने संकल्प से वे तनिक भी विचलित नहीं हुईं। माता पर्वती भी घर से निकल उसी शिखर पर तपस्या करने लगीं, जहाँ शिवजी ने तपस्या की थी। शिखर पर तपस्या में माँ पार्वती ने पहले वर्ष फलाहार से जीवन व्यतीत किया, दूसरे वर्ष वे वृक्षों के पत्ते खाकर रहने लगीं और फिर तो उन्होंने पर्ण का भी त्याग कर दिया।
इस प्रकार पार्वती ने तीन हजार वर्ष तक तपस्या की। माँ पार्वती कि कठोर तपस्या को देख ऋषि-मुनि भी दंग रह गए। अंत में भगवान भोले का आसन हिला। उन्होंने पार्वती की परीक्षा के लिए पहले सप्तर्षियों को भेजा और पीछे स्वयं वटुवेश धारण कर पार्वती की परीक्षा के निमित्त प्रस्थान किया।
जब भगवान् शिवने सब प्रकार से जाँच-परखकर देख लिया कि पार्वती कि उनमें अविचल निष्ठा हैं, तब तो वे अपने को अधिक देर तक न छिपा सके। वे तुरंत अपने असली रूप में पार्वती के सामने प्रकट हो गए और उन्हें पाणिग्रहण का वरदान देकर अंतर्धान हो गए।
पार्वती अपने तप को पूर्ण होते देख घर लौट आईं और अपने माता-पिता से सारा वृत्तांत कह सुनाया। अपनी दुलारी पुत्री की कठोर तपस्या को फलीभूत होता देखकर माता-पिता के आनंद का ठिकाना नहीं रहा। भगवान् शंकर ने सप्तर्षियों को विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमालय के पास भेजा और इस प्रकार विवाह की शुभ तिथि निश्चित होगई।
सप्तर्षियों द्वारा विवाह की तिथि निश्चित कर दिए जाने के बाद भगवान् शंकरजी ने नारदजी द्वारा सारे देवताओं को विवाह में सम्मिलित होने के लिए आदरपूर्वक निमंत्रित किया और अपने गणों को बारात की तैयारी करने का आदेश दिया। 
भगवान् शिव के इस आदेश से अत्यंत प्रसन्न होकर गणेश्वर शंखकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, कुंडक, काकपादोदर, मधुपिंग, प्रमथ, वीरभद्र आदि गणों के अध्यक्ष अपने-अपने गणों को साथ लेकर चल पड़े।नंदी, क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज भी कोटि-कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नीले चिन्ह थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म लगी हुई थी।इन गणों के साथ शंकरजी के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गई। इनमें डाकनी, शाकिनी, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस आदि भी शामिल थे। इन सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे। वे सबके सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए शंकरजी के चारों ओर एकत्रित हो गए।
चंडीदेवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुई भगवान रुद्रदेव की बहन बनकर वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण पहन रखे थे। वे प्रेत पर बैठकर अपने मस्तक पर सोने का कलश धारण किए हुए थीं।धीरे-धीरे वहाँ सारे देवता भी एकत्र हो गए। उस देवमंडली के बीच में भगवान श्री विष्णु गरुड़ पर विराजमान थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनके पास में मूर्तिमान्वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकाद महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा कई परिजनों के साथ उपस्थित थे।
देवराज इंद्र भी कई आभूषण पहन अपने ऐरावत गज पर बैठ वहाँ पहुँचे थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहाँ आ गए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नर भी शिवजी की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ पहुँच गए थे। इनके साथ ही सभी जगन्माताएँ, देवकन्याएँ, देवियाँ तथा पवित्र देवांगनाएँ भी वहाँ आ गई थीं। इन सभी के वहाँ मिलने के बाद भगवान शंकरजी अपने स्फुटिक जैसे उज्ज्वल, सुंदर वृषभ पर सवार हुए। दूल्हे के वेश में शिवजी की शोभा निराली ही छटक रही थी। इस दिव्य और विचित्र बारात के प्रस्थान के समय डमरुओं की डम-डम, शंखों के गंभीर नाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के मनमोहक नृत्य और मंगल गीतों की गूँज से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे।
उधर हिमालय ने विवाह के लिए बड़ी धूम-धाम से तैयारियाँ कीं और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालय के द्वार पर आ लगी। पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनकी भूत-प्रेतों की सेना को देखकर मैना बहुत डर गईं और उन्हें अपनी कन्या का पाणिग्रहण कराने में आनाकानी करने लगीं। पीछे से जब उन्होंने शंकरजी का करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला सोलह वर्ष की अवस्था का परम लावण्यमय रूप देखा तो वे देह गेह कि सुधि भूल गईं और शंकर पर अपनी कन्या के साथ ही साथ अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर दिया। शिव गौरी का विवाह आनंद पूर्वक संपन्न हुआ। हिमाचल ने कन्यादान दिया। विष्णु भगवान तथा अन्यान्य देव और देव-रमणियों ने नाना प्रकार के उपहार भेंट किए। ब्रह्माजी ने वेदोक्त रीति से विवाह करवाया। सब लोग अमित उत्साह से भरे अपने-अपने स्थानों को लौट गए।
(2). भगवान् शिव और माता पार्वती का विवाह :: जगत् के सभी छोटे बड़े पर्वत, वन, समुद्र, नदियाँ तालाब आदि हिमाचल का निमन्त्रण पाकर इच्छानुसार रूप धारण कर उस विवाह में सम्मिलित थे। हिमाचल के नगर को सुन्दरतापूर्वक सजाया गया था।
हिमवान के घर से भगवान् शिव को लग्न पत्रिका भेजी गई, जिसे उन्होंने विधिपूर्वक बाँच कर हर्ष के साथ स्वीकार किया तथा लग्न-पत्रिका लाने वालों का यथोचित आदर-सम्मान कर, उन्हें विदा किया। तदनंतर, भगवान् शिव ने ऋषियों से कहा कि, "आप लोगों ने उनके कार्य का भली प्रकार से संपादन किया, अब उन्होंने विवाह स्वीकार कर लिया हैं, अतः सभी को विवाह में चलना चाहिये।" तदनंतर, भगवान् शिव ने नारद जी का स्मरण किया, जिस कारण वे तक्षण ही वहां उपस्थित हुए। भगवान् शिव ने उनसे कहा, “नारद! तुम्हारे उपदेश से ही पार्वती ने कठोर तपस्या कर मुझे संतुष्ट किया हैं तथा मैंने उनका पति रूप से पाणिग्रहण करने का निश्चय किया। सप्त-ऋषियों ने लग्न का साधन और शोधन कर दिया हैं, आज से सातवें दिन मेरा विवाह हैं। इस अवसर पर मैं लौकिक रीति का आश्रय लेकर महान उत्सव करूँगा, तुम भगवान् विष्णु आदि सब देवताओं, मुनियों, सिद्धों तथा अन्य लोगों को मेरे ओर से निमंत्रित करो।" भगवान् शिव की आज्ञानुसार नारद जी ने तीनों लोकों में सभी को शिव-विवाह का निमंत्रण दिया तथा अंततः कैलाश पर लौट आयें।
सप्तर्षियों ने हिमाचल के घर जाकर भगवान् शिव और पार्वती के विवाह के लिये वेद की विधि के अनुसार शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी का निश्चय कर लग्नपत्रिका तैयार कर ब्रह्मा जी के पास पहुँचा दिया। भगवान् शिव के विवाह की सूचना पाकर समस्त देवता अपने विमानों में आरूढ़ होकर भगवान् शिव के यहाँ पहुँच गये।
भगवान् शिव के गणों ने भगवान् शिव की जटाओं का मुकुट बनाकर और सर्पों के मौर, कुण्डल, कंकण उनका श्रृंगार किया और वस्त्र के स्थान पर बाघम्बर लपेट दिया। तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव के सुन्दर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा जी, गले में विष और वक्ष पर मुण्डों की माला शोभा दे रही थी। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू सुशोभित थे।
चंडी देवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुई भगवान् रुद्रदेव की बहन बनकर वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण पहन रखे थे। वे प्रेत पर बैठकर अपने मस्तक पर सोने का कलश धारण किए हुए थीं।
धीरे-धीरे वहाँ सारे देवता भी एकत्र हो गए। उस देवमंडली के बीच में भगवान् श्री विष्णु गरुड़ पर विराजमान थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनके पास में मूर्तिमान्वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकादि महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा कई परिजनों के साथ उपस्थित थे।
देवराज इंद्र भी कई आभूषण पहन अपने ऐरावत गज पर बैठ वहाँ पहुँचे थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहाँ आ गए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नर भी भगवान् शिव की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ पहुँचे। इनके साथ ही सभी जगन्माताएँ, देवकन्याएँ, देवियाँ तथा पवित्र देवांगनाएँ भी वहाँ आ गई थीं। इन सभी के वहाँ मिलने के बाद भगवान् शंकर अपने स्फुटिक जैसे उज्ज्वल, सुंदर वृषभ पर सवार हुए। दूल्हे के वेश में भगवान् शिव की शोभा निराली ही थी। इस दिव्य और विचित्र बारात के प्रस्थान के समय डमरुओं की डम-डम, शंखों के गंभीर नाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के मनमोहक नृत्य और मंगल गीतों की गूँज से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे।
भगवान् शिव बैल पर चढ़ कर चले। बाजे बज रहे थे। देवांगनाएँ उन्हें देख कर मुस्कुरा रही थीं और विनोद पूर्वक कह रही थीं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में शायद ही हो। ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त देवताओं के साथ ही साथ भगवान् शिव जी समस्त गण भी बाराती थे। उनके गणों में कोई बिना मुख का था तो किसी के अनेक मुख थे, कोई बिना हाथ पैर का था तो किसी के कई हाथ पैर थे, किसी की एक भी आँख नहीं थी तो किसी के बहुत सारी आँखें थीं, कोई पवित्र वेष धारण किये था तो कोई बहुत ही अपवित्र वेष धारण किया हुआ था। सब मिला कर प्रेत, पिशाच और योगनियों की जमात चली जा रही थी बारात के रूप में।
इनमें डाकनी, शाकिनी, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस आदि भी शामिल थे। इन सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे। वे सबके सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए भगवान् शंकर के चारों ओर एकत्रित हो गए।
गणेश्वर शंखकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, विकृतानन, दुन्दुभ, कपाल, कुंडक, काकपादोदर, मधुपिंग, प्रमथ, वीरभद्र आदि गणों के अध्यक्ष अपने-अपने गणों को साथ लेकर चल पड़े।
नंदी, क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज भी कोटि-कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नीले चिन्ह थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म लगी हुई थी।
इन गणों के साथ भगवान् शंकर के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गई।
भगवान् शिव के सभी गण भारी उत्सव माना रहें थे, भगवान् विष्णु अपनी पत्नी माता लक्ष्मी के साथ आपने पार्षदों सहित, साथ ही भगवान् ब्रह्मा अपने गणों के साथ कैलाश पर आये। समस्त लोकपाल भी अपनी पत्नियों के साथ सज-धज कर कैलाश पर आये; मुनि, नाग, सिद्ध, उप-देवता तथा अन्य लोग भी कैलाश पर गए तथा शिव-गणों  के साथ उत्सव मनाने लगे। भगवान् शिव ने अपने स्वाभाविक भेष के अनुसार ही नाना आभूषणों को धारण किया, उनका स्वरूप बड़ा ही आकर्षक था। कैलाश पर उपस्थित सभी उनके विवाह में जाने हेतु तैयार हुए, भगवान् विष्णु ने भगवान् शिवसे कहा! “गृह-सुत्रोक्त विधि के अनुसार आप पार्वती से विवाह करें, जिससे यह विधि लोक-विख्यात हो जाये तथा अपने कुलधर्म के अनुसार मंडप-स्थापन एवं नंदी-मुख श्राद्ध भी करें।” भगवान् विष्णु के कथन अनुसार भगवान् शिव ने विधिपूर्वक समस्त कार्य किये, उनके समस्त कार्य स्वयं भगवान् ब्रह्मा तथा उनके नाना महर्षि पुत्र आभ्युदयिक करने लगे। सभी ऋषियों ने बड़े हर्ष के साथ बहुत से मांगलिक कार्य किये, विघ्नों के शांति हेतु ग्रहों और समस्त मंडलवर्ती देवताओं का पूजन किया गया। समस्त प्रकार के लौकिक, वैदिक कर्म यथोचित रीति से कर भगवान् शिव बहुत संतुष्ट हुए, तदनंतर वे ऋषियों तथा देवताओं को आगे कर कैलाश से हिमवान के घर जाने हेतु निकले। उन्होंने अपने कुछ गणों को कैलाश पर ही ठहरने तथा बाकी गणों को हिमालय की नगरी की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया।
अपने स्वामी द्वारा आदेश पाकर, सभी प्रमथ इत्यादि गण, भूत-प्रेतों के संग महान उत्सव करते हुए चले। नंदी, भैरव एवं क्षेत्रपाल असंख्य गणों के साथ भारी उत्सव मानते हुए चले, वे सभी अनेक हाथों से युक्त थे, सर पर जटा, उत्तम भस्म तथा रुद्राक्ष इत्यादि आभूषण धारण किये हुए थे। चंडी देवी, रुद्र के बहन रूप में उत्सव मानते हुए माथे पर सोने का कलश धारण किये हुई थीं, वे अपने वाहन प्रेत पर आरूढ़ थीं। उस समय डमरुओं के घोष, भेरियों की गड़गड़ाहट तथा शंख-नाद से तीनों लोक गूंज उठा था, दुन्दुभियों की ध्वनि से महान कोलाहल हो रहा था। समस्त देवता, शिव गणों के पीछे रहकर बरात का अनुसरण कर रहें थे, समस्त लोकपाल तथा सिद्ध-गण भी उन्हीं के साथ थे। देवताओं के मध्य में गरुड़ पर विराज-कर भगवान् विष्णु चल रहें थे, उनके पार्षदों ने उन्हें नाना आभूषणों से विभूषित किया था, साथ ही भगवान् ब्रह्मा भी वेद-पुराणों के साथ थे। शाकिनी, यातुधान, बेताल, ब्रह्म-राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, प्रमथ, गन्धर्व, किन्नर बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार की ध्वनि करने हुए चल रहें थे। देव-कन्याएँ, जगन्माताऍ तथा अन्य देवांगनाएँ बड़ी प्रसन्नता के साथ भगवान् शिव के विवाह में सम्मिलित होने हेतु आयें थे।
सर्वप्रथम भगवान् शिव ने नारद जी को हिमालय के घर भेजा, वे वहाँ की सजावट देखकर दंग रह गए। देवताओं, अन्य लोगों तथा अपने गणों सहित भगवान् शिव हिमालय के नगर के समीप आयें, हिमालय ने नाना पर्वतों तथा ब्राह्मणों को उनसे वार्तालाप करने तथा अगवानी हेतु भेजा। समस्त देवताओं को भगवान् शिव के बरात में देखकर हिमालय-राज को बड़ा ही विस्मय हुआ तथा वे अपने आप को धन्य मानने लगे। भगवान् शिव को अपने सामने देखकर हिमवान ने उन्हें प्रणाम किया, साथ ही पर्वतों तथा ब्राह्मणों ने भी उनकी वंदना की। भगवान् शिव अपने वाहन वृषभ पर आरूढ़ थे, उनके बाएँ भाग में भगवान् विष्णु तथा दाहिने भाग में भगवान् ब्रह्मा उपस्थित थे। हिमवान ने अन्य सभी देवताओं को भी मस्तक झुकाया, तत्पश्चात भगवान् शिव की आज्ञा से वे सभी को अपने नगर में ले गए।
भगवान् शिव का भेष बड़ा ही निराला हैं, समस्त प्रकार के विस्मित कर देने वाले तत्व इन्हें प्रिय हैं। वे अद्भुत वर के रूप में सज-धज कर अपनी बारात ले हिमालय राज के घर गए थे; ये वृषभ पर आरूढ़ थे, शरीर में चिता भस्म लगाये हुए, पाँच मस्तकों से युक्त थे, बाघाम्बर एवं गज चर्म इन्होंने वस्त्र के रूप में धारण कर रखा था। आभूषण के रूप में हड्डियों, मानव खोपड़ियों तथा रुद्राक्ष की माला शरीर में धारण किये हुए थे, अपने दस हाथों में खप्पर, पिनाक, त्रिशूल, डमरू, धनुष आदि अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए थे। साथ ही इनके संग आने वाले समस्त बाराती या गण भूत-प्रेत, बेताल इत्यादि भयंकर भय-भीत कर देने वाले अद्भुत रूप में थे। मर्मर नाद करते हुए, बवंडर के समान, टेढें-मेढें मुंह तथा शरीर वाले अत्यंत कुरूप, लंगड़े-लूले-अंधे, दंड, पाश, मुद्गर, हड्डियाँ, धारण किये हुए थे। बहुत से गणो के मस्तक नहीं थे तथा किन्हीं के एक से अधिक मस्तक थे, कोई बिना हाथ के तथा उलटे हाथ वाले, बहुत से मस्तक पर कई चक्षु वाले, कुछ नेत्र हीन थे तथा कुछ एक ही चक्षु वाले थे, किसी के बहुत से कान थे और किसी के एक भी नहीं थे। 
सभी बाराती जब हिमाचल नगरी के पास पहुँचे तब नारद जी ने गिरिराज हिमालय को सूचना दी। हिमवान तत्काल ही विभिन्न स्वागत सामग्रियों के साथ भगवान् शिव का दर्शन करने चल पड़े। उन्होंने समस्त देव सम्माज को अपने यहाँ आया देख कर आनंदमग्न हो गए। उन्होंने भाव विभोर होकर समस्त देवताओं का स्वागत किया। हिमराज, मन ही मन सोचने लगे कि उनसे ज्यादा भाग्यवान कोई नहीं है। उन्होंने सभी का स्वागत सत्कार किया और सभी को प्रणाम कर, अपने निवास स्थान पर लौट आये।
इस अवसर पर मैना के मन में भगवान् शिव के दर्शन की इच्छा हुई तथा उन्होंने नारद जी को बुलवाया तथा उनसे कहने लगी कि! पार्वती ने जिसके हेतु कठोर तप किया, सर्व प्रथम मैं उन भगवान् शिव को देखूुँगी। भगवान् शिव, मैना के मन के अहंकार को समझ गए थे, इस कारण उन्होंने भगवान् श्री हरी विष्णु तथा भगवान् ब्रह्मा सहित समस्त देवताओं को पहले ही भवन में प्रवेश करा दिया तथा स्वयं पीछे से आने का निश्चय किया।
इस उद्देश्य से मैना अपने भवन के ऊपर नारद जी संग गई एवं बारात को भली प्रकार से देख रहीं थीं। प्रत्येक दल के स्वामी को देखकर मैना, नारद जी से पूछती थीं, क्या यही भगवान् शिव हैं? नारद जी उत्तर देते थे कि यह तो भगवान् शिव के सेवक हैं। मैना मन ही मन आनंद से विभोर हो सोचने लगती, जिसके सेवक इतने सुन्दर हैं उनके स्वामी पता नहीं कितने सुन्दर होंगे। भगवान् विष्णु के अद्भुत स्वरूप को देखकर मैना को लगा की "अवश्य ही वे भगवान् शिव हैं, इसमें संशय नहीं हैं।" इस पर नारद जी ने कहा! “वे भी पार्वती के वर नहीं हैं, वे तो केशव श्री हरी विष्णु हैं। पार्वती के वर तो इनसे भी अधिक सुन्दर हैं, उनकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता हैं। इस पर मैना ने अपने आप को बहुत ही सौभाग्यशाली मना, जिसने पार्वती को जन्म दिया, वे इस प्रकार सोच ही रहीं थी की भगवान् शिव सामने आ गए। उनकी तथा उनके गणों की भेष-भूषा तथा स्वरूप उनके अभिमान को चूर-चूर करने वाले थे, नारद जी ने भगवान् शिव को इंगित कर मैना को बताया की वे ही पार्वती के पति भगवान् शिव हैं।
सर्वप्रथम मैना ने भूत-प्रेतों से युक्त नाना शिव-गणों को देखा; उनमें से कितने ही बवंडर का रूप धारण किये हुए, टेढ़े-मेंढ़े मुखाकृति और मर्मर ध्वनि करने वाले थे। प्रायः सभी बहुत ही कुरूप स्वरूप वाले थे, कुछ विकराल थे, किन्हीं का मुंह दाढ़ी-मूँछ से भरा हुआ था, बहुत से लंगड़े थे तो कई अंधे, किसी की एक से अधिक आँख थे तो किसी की एक भी नहीं, कोई बहुत हाथ तथा पैर वाले थे तो कुछ एक हाथ एवं पैर युक्त। वे सभी गण दंड, पाश तथा मुद्गर इत्यादि धारण किये हुए बारात में आयें थे, कोई वाहन उलटे चला रहे थे, कोई सींग युक्त थे, कई डमरू तथा गोमुख बजाते थे, कितने ही गण मस्तक विहीन थे। कुछ एक के उलटे मुख थे तो किसी के बहुत से मुख थे, किन्हीं के बहुत सारे कान थे, कुछ तो बहुत ही डरावने दिखने वाले थे, वे सभी अद्भुत प्रकार की भेष-भूषा धारण किये हुए थे। वे सभी गण बड़े ही विकराल स्वरूप वाले तथा भयंकर थे, जिनकी कोई सँख्या नहीं थीं। नारद जी ने उन सभी गणों को मैना को दिखाते हुए कहा, पहले आप भगवान् शिव के सेवकों को देखे, तदनंतर उनके भी दर्शन करना। परन्तु, उन असंख्य विचित्र-कुरूप-भयंकर स्वरूप वाले भूत-प्रेतों को देखकर मैना (मैना) भय से व्याकुल हो गई।
इन्हीं गणो के बीच में भगवान् शिव अपने वाहन वृषभ पर सवार थे, नारद जी ने अपनी उँगली से इंगित कर उन्हें मैना को दिखाया। उनके पञ्च मुख थे और सभी मुख पर 3 नेत्र थे, मस्तक पर विशाल जटा समूह था। उन्होंने शरीर में भस्म धारण कर रखा था, जो उनका मुख्य आभूषण हैं तथा दस हाथों से युक्त थे, मस्तक पर जटा-जुट और चन्द्रमा का मुकुट धारण किये हुए थे। वे अपने हाथों में कपाल, त्रिशूल, पिनाक इत्यादि अस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आँखें बड़े ही भयानक दिख रहीं थीं, वे शरीर पर बाघाम्बर तथा हाथी का चर्म धारण किये हुए थे।भगवान् शिव का ऐसा रूप देखकर मैना भय के मरे व्याकुल हो गई, काँपने लगी तथा भूमि पर गिर गयी एवं मूर्छित हो गई। वहां उपस्थित स्वजनों ने मैना की नाना प्रकार की सेवा कर उन्हें स्वस्थ किया।
[यहाँ भावना का प्रश्न है। जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तीन तैसी।]
जब मैना को चेत हुआ, तब वे अत्यंत क्षुब्ध हो विलाप करने लगी तथा अपने पुत्री को दुर्वचन कहने लगी; साथ ही उन्होंने नारद मुनि को भी बहुत उलटा-सीधा सुनाया। मैना, नारद जी से बोलीं, “भगवान् शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु पार्वती को तपस्या करने का पथ तुमने दिखाया, तदनंतर हिमवान को भी शिव-पूजा करने का परामर्श दिया, इसका फल ऐसा अनर्थकारी एवं विपरीत होगा यह मुझे ज्ञात नहीं था। दुर्बुद्धि देवर्षि! तुमने मुझे ठग लिया हैं, मेरी पुत्री ने ऐसा तप किया जो महान मुनियों के लिए भी दुष्कर हैं, इसका उसे ऐसा फल मिला? यह सभी को दुःख में ही डालने वाला हैं। हाय! अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे जीवन का नाश हो गया हैं, मेरा कुल भ्रष्ट हो गया हैं, वे सभी दिव्य सप्त-ऋषि कहा गए? उनकी तो मैं दाड़ी-मूँछ नोच लुंगी, वशिष्ठ जी की पत्नी भी बड़ी ही धूर्त निकली। पता नहीं किस अपराध से मेरा सब कुछ नष्ट हो गया हैं"।
तदनंतर, वे पार्वती की ओर देखकर दुर्वचन कहने लगी, “अरी दुष्ट ! तूने यह क्या किया? मुझे दुःखी किया हैं, तूने सोना देकर काँच का क्रय किया, चन्दन छोड़कर अपने अंगों में कीचड़ लगाया हैं। प्रकाश की लालसा में सूर्य को छोड़कर जतन कर जुगनू को पकड़ा हैं, गंगा जल का त्याग कर कुएँ का जल पीया है, सिंह का सेवन छोड़कर सियार के पास गई हैं। घर में रखी हुई यश की मंगलमयी विभूति का त्याग कर चिता की अमंगल भस्म अपने पल्लू में बाँधा हैं, तुमने सभी देवताओं को छोड़कर, शिव को पाने के लिए इतना कठोर तप किया हैं! तुझको धिक्कार हैं! धिक्कार हैं! तपस्या हेतु उपदेश देने वाले दुर्बुद्धि नारद तथा तेरी सखियों को धिक्कार हैं! हम दोनों माता-पिता को धिक्कार हैं, जिसने तुझ जैसी दुष्ट कन्या को जन्म दिया हैं! सप्त-ऋषियों को धिक्कार हैं! तूने मेरा घर ही जला कर रखा दिया हैं, यह तो मेरा साक्षात् मरण ही हैं। हिमवान अब मेरे समीप न आयें, सप्त-ऋषि मुझे आज से अपना मुँह न दिखाए, तूने मेरे कुल का नाश कर दिया हैं, इससे अच्छा तो यह था की मैं बाँझ ही रह जाती। मैं आज तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर, तेरा त्याग करके कही और चली जाऊंगी, मेरा तो जीवन ही नष्ट हो गया हैं"।
ऐसा कहकर मैना पुनः मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी, उस समय सभी देवता उनके निकट गए। पुनः उनकी चेतना वापस आने पर नारद जी उनसे बोले, “आपको पता नहीं भगवान् शिव का स्वरूप बड़ा ही मनोरम हैं, आपने जो देखा वह उनका यथार्थ रूप नहीं हैं। आप अपने क्रोध का त्याग कर स्वस्थ हो जाइये तथा पार्वती-शिव के विवाह में अपने कर्तव्य को पूर्ण करें"। इस पर मैना अधिक क्रोध-युक्त होकर नारद जी से बोलीं! “मुनिराज आप दुष्ट तथा अधमों के शिरोमणि हैं, आप यहाँ से दूर चले जाए।” मैना द्वारा इस प्रकार कहने पर देवराज इंद्र तथा अन्य देवता और दिक्पाल मैना से बोले, “तुम हमारे वचनों को प्रसन्नता पूर्वक सुनो! भगवान् शिव उत्कृष्ट देवता तथा सभी को उत्तम सुख प्रदान करने वाले हैं, आपकी कन्या के तप से प्रसन्न होकर ही उन्होंने पार्वती को उत्तम वर प्रदान किया हैं। यह सुनकर मैना देवताओं से विलाप कर कहने लगी! “उस शिव का स्वरूप बड़ा ही डरावना हैं, मैं उसके हाथों में अपनी कन्या का दान नहीं करूँगी, सभी देवता मेरी कन्या के उत्कृष्ट स्वरूप को क्यों प्रपंच कर व्यर्थ करने हेतु उद्धत हैं?" तदनंतर, मैना के पास सप्त-ऋषि गण आयें और कहने लगे, “पितरों की कन्या मैना, हम तुम्हारे कार्य सिद्धि हेतु आयें हैं। जो कार्य उचित हैं, उसे तुम्हारे हठ के कारण हम विपरीत क्यों मान ले? भगवान् शिव देवताओं में सर्वोच्च हैं, वे साक्षात दान पात्र होकर तुम्हारे घर पर आयें हैं।” इसपर मैना को भरी क्रोध हुआ तथा उन्होंने कहा! “मैं अपनी कन्या के अस्त्र से टुकड़े-टुकड़े कर दूंगी, परन्तु उस शिव के हाथों में अपनी पुत्री को नहीं दुँगी, तुम सब मेरे सामने से चले जाओ और कभी मेरे सामने ना आना"।
पार्वती की माता के हठ त्याग न करने पर वहाँ हाहाकार मच गया, तदनंतर हिमवान, मैना के पास आयें और प्रेम पूर्वक नाना तत्त्वों को दर्शाते हुए उन्हें समझाने लगे। उन्होंने कहा! “तुम इस प्रकार व्याकुल क्यों हो रही हो? मेरी बातों को ध्यान पूर्वक सुनो! भगवान् शिव के नाना रूपों को तुम भली प्रकार जानती हो, इस पर भी तुम उनकी निंदा क्यों कर रही हो? उनके विकट रूप को देखकर तुम घबरा गई हो, वे ही सबके पालक हैं, अनुग्रह तथा निग्रह करने वाले हैं, सबके पूजनीय हैं। पहली बार यहाँ आकर उन्होंने कैसी लीलाएँ की थीं, क्या तुम्हें वह सब स्मरण नहीं है?” इसपर मैना ने हिमवान से कहा! “आप अपनी पुत्री के गले में रस्सी बाँध कर, उसे पर्वत से नीचे गिरा दीजिये या इसे ले जाकर निर्दयता पूर्वक सागर में डूबा दीजिये, मैं पार्वती को शिव के हाथों में नहीं दूुँगी। यदि आपने पुत्री का दान विकट रूपधारी शिव को किया तो मैं अपना शरीर त्याग दूंगी।“ मैना के इस प्रकार के वचनों को सुनकर पार्वती स्वयं अपनी माता से आकर बोलीं, “इस समय आपकी बुद्धि विपरीत कैसे हो गयी हैं? आपने धर्म का त्याग कैसे कर दिया हैं? रुद्र-देव ही सर्व उत्पत्ति के कारण-भूत साक्षात् परमेश्वर हैं, इनसे बढ़कर दूसरा कोई भी नहीं हैं। समस्त श्रुतियाँ उन्हें ही सुन्दर रूप वाले तथा सुखद मानते हैं, समस्त देवताओं के स्वामी हैं, केवल इनके नाम और रूप अनेक हैं। भगवान् ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु भी इनकी सेवा करते हैं, भगवान् शिव ही सभी के अधिष्ठान, कर्ता, हर्ता तथा स्वामी हैं, सनातन एवं अविनाशी हैं। इनके हेतु ही सभी देवता किंकर हो आपके द्वार पर उत्सव मना रहें हैं, इससे बढ़कर और क्या हो सकता हैं? आप सुख पूर्वक उठकर मेरा हाथ उन परमेश्वर की सेवा में प्रदान करें, मैं स्वयं आपसे यह कह रहीं हूँ, आप मेरी इतनी सी विनती मान ले। यदि आपने मुझे इनके हाथों में नहीं दिया तो कभी किसी और वर का वरण नहीं करूँगी। मैंने मन, वाणी और क्रिया द्वारा स्वयं भगवान् शिव का वरण किया हैं, अब आप जैसा उचित समझे करें।” इस पर वे पार्वती पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें दुर्वचन कहते हुए विलाप करने लगीं।
भगवान् ब्रह्मा तथा सनकादी ऋषियों ने भी उन्हें इस विषय में बहुत समझाया परन्तु वे नहीं मानी, मैना की हठ की बात सुनकर भगवान् श्री विष्णु तुरंत वह आयें तथा उन्होंने कहा, “तुम पितरों की मानसी पुत्री हो, साथ ही हिमवान की प्रिय पत्नी हो, तुम्हारा सम्बन्ध साक्षात् भगवान् ब्रह्मा के कुल से हैं। तुम धर्म की आधार-भूता हो, फिर धर्म का त्याग क्यों कर रहीं हो? तुम भली-प्रकार से सोच-विचार करो! सम्पूर्ण देवता, ऋषि, भगवान् ब्रह्मा तथा स्वयं मैं, हम सभी तुम्हारा क्यों अहित चाहेंगे? क्या तुम भगवान् शिव को नहीं जानती हो? वे तो सगुण भी हैं और निर्गुण भी, कुरूप हैं और सुरूप भी। उनके रूप का वर्णन कौन कर पाया हैं? मैंने तथा भगवान् ब्रह्मा ने भी उनका अंत नहीं पाया, फिर उन्हें कौन जान सकता हैं? भगवान् ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यंत इस चराचर जगत में जो भी दिखाई देता हैं, वह सब भगवान् शिव का ही स्वरूप हैं। वे अपनी लीला से अनेक रूपों में अवतरित होते हैं, तुम दुःख का त्याग करो तथा भगवान् शिव का भजन करो, जिससे तुम्हें महान आनंद की प्राप्ति होगी, तुम्हारा सारा क्लेश मिट जायेगा।” भगवान् पुरुषोत्तम श्री हरी विष्णु द्वारा इस प्रकार समझाने पर मैना का मन कुछ कोमल हुआ, परन्तु वे भगवान् शिव को अपनी कन्या का दाना न देने के हठ पर टिकी रहीं। कुछ क्षण पश्चात, भगवान् शिव की माया से मोहित होने पर मैना से भगवान् श्री हरी से कहा! “यदि वे सुन्दर, मनोरम शरीर धारण कर ले तो मैं अपनी पुत्री का दान उन्हें कर दुँगी; अन्य किसी उपाय से वे मोहित नहीं होंगी।”
मैना ने जब यह कहा कि भगवान् शिव यदि सुन्दर रूप धारण कर लें तो मै अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूँगी। इसे सुनकर नारद जी भगवान् शिव के पास गये और उनसे सुन्दर रूप धारण करने का अनुरोध किया।भगवान् शिव दयालु एवं भक्तवत्सल हैं ही। उन्होंने नारद जी के अनुरोध को स्वीकार करके सुन्दर दिव्यरूप धारण कर लिया। उस समय उनका स्वरूप कामदेव से भी अधिक सुन्दर एवं लावण्यमय था।तब नारद जी ने मैना को भगवान् शिव के सुन्दर स्वरूप का दर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
मैना ने जब शिव जी के स्वरूप को देखा तो वे आश्चर्यचकित हो गयीं। उस समय भगवान् शिव का शरीर करोड़ों सूर्यों से भी अधिक तेजस्वी और देदीप्यमान था। उनके अंग-प्रत्यंग मे सौन्दर्य की लावण्यमयी छटा विद्यमान थी।उनका शरीर सुन्दर वस्त्रों एवं रत्नाभूषणों से आच्छादित था। उनके मुख पर प्रसन्नता एवं मन्द मुस्कान की छटा सुशोभित थी।उनका शरीर अत्यन्त लावण्यमय, मनोहर, गौरवर्ण एवं कान्तिमान था। भगवान् विष्णु आदि सभी देवता उनकी सेवा में संलग्न थे।सूर्य देव उनके ऊपर छत्र ताने खड़े थे। चन्द्र देव मुकुट बनकर उनके मस्तक की शोभा बढ़ा रहे थे। गँगा और यमुना सेविकाओं की भाँति चँवर डुला रही थीं। आठों सिद्धियाँ उनके समक्ष नृत्य कर रही थीं। भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु सहित सभी देवता, ऋषि-मुनि उनके यशोगान मे संलग्न थे। उनका वाहन भी सर्वांग विभूषित था।वस्तुतः उस समय भगवान् शिव की जो शोभा थी, वह नितान्त अतुलनीय एवं अवर्णनीय थी। उसका वर्णन करना मानव-सामर्थ्य के परे था। 
भगवान् शिव के ऐसे विलक्षण स्वरूप को देखकर मैना अवाक् सी रह गयीं। वे गहन आनन्द सागर में निमग्न हो गयीं। कुछ देर बाद प्रसन्नता पूर्वक बोलीं :-हे प्रभुवर! मेरी पुत्री धन्य है। उसके कठोर तप के प्रभाव से ही मुझे आपका दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैंने अज्ञानतावश आपकी निन्दारूपी जो अपराध किया है; वह अक्षम्य है। परन्तु आप भक्तवत्सल एवं करुणानिधान हैं। इसलिए मुझ मन्दबुद्धि को क्षमा करने की कृपा करें। मैना की अहंकार रहित प्रार्थना को सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये। उसके बाद स्त्रियों ने चन्दन अक्षत से भगवान् शिव का पूजन किया और उनके ऊपर खीलों की वर्षा की। इस प्रकार के स्वागत-सत्कार को देखकर देवगण भी प्रसन्न हो गये।
मैना जब भगवान् शिव की आरती करने लगीं तब उनका स्वरूप और अधिक सुन्दर एवं मनभावन हो गया। उस समय उनके शरीर की कान्ति सुन्दर चम्पा के समान अत्यन्त मनोहर थी। उनके मुखारविन्द पर मन्द-मन्द मुस्कान सुशोभित हो रही थी। उनका सम्पूर्ण शरीर रत्नाभूषणों से सुसज्जित था। गले मे मालती की माला तथा मस्तक पर रत्नमय मुकुट धारण करने से उनका मुखमण्डल श्वेत प्रभा से उद्भाषित हो रहा था। अग्नि के समान निर्मल, सूक्ष्म, विचित्र एवं बहुमूल्य वस्त्रों के कारण उनके शरीर की शोभा द्विगुणित हो रही थी। उनका मुख करोड़ों चन्द्रमाों से भी अधिक आह्लादकारी था। उनका सम्पूर्ण शरीर मनोहर अंगराग से सुशोभित हो रहा था। उन्होंने अपनी विलक्षण प्रभा से सबको आच्छादित कर लिया था।
यह सब देखकर मैना कुछ क्षण के लिए तो चित्र-लिखित सी रह गई तथा उन्होंने भगवान शिव से कहा, “मेरी पुत्री धन्य हैं, जिसके कठोर तप से संतुष्ट हो आप इस घर पर पधारे हैं। मैंने अपने कुबुद्धि के कारण आपकी जी निंदा की हैं, उसे आप क्षमा कर प्रसन्न हो जायें।” मैना ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान् शिव को प्रणाम किया, उस समय मैना के घर में उपस्थित अन्य स्त्रियों ने भी उनके दर्शन किये तथा सभी चकित रह गए।
भगवान् शिव के इस विलक्षण स्वरूप को देखकर मैना रानी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। वे भगवान् शिव के अगाध सौन्दर्यरस का नेत्रनलिन से पान करती हुई उनकी आरती करने लगीं। वे मन ही मन सोचने लगीं कि आज भगवान् शिव के इस दुर्लभ स्वरूप का दर्शन करके मैं भी धन्य हो गयी। मुझे जीवन भर के पुण्य प्रताप का सम्पूर्ण फल मिल गया। मैना ने भगवान् शिव की विधिवत आरती की। इसके बाद द्वार पूजा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस प्रकार आरती करके वे घर के अन्दर चली गयीं।
द्वार पूजा आदि के बाद बारात जनवासे की ओर चल पड़ी। इधर पार्वती जी अपनी कुल देवी का पूजन करने गयीं। उस समय उनका स्वरूप अत्यन्त सुन्दर एवं दर्शनीय था। उनकी अंगकान्ति नीलाञ्जन सदृश अत्यन्त मनमोहक थी। उनके अंग-प्रत्यंग सौन्दर्य से परिपूर्ण थे। उनका मुखमण्डल मन्द मुस्कान से सुशोभित था।उनकी दृष्टि अत्यन्त पैनी एवं मनोहारिणी थी।नेत्रों की आकृति कमल को भी लज्जित कर रही थी। उनकी केशराशि बहुत सुन्दर एवं हृदयाकर्षक थी।कपोलों पर बनी हुई पत्रभंगी के कारण उनकी शोभा द्विगुणित हो रही थी। ललाट मे कस्तूरी और सिन्दूर कि बिन्दी अत्यधिक शोभायमान थी।
पार्वती जी का सम्पूर्ण शरीर बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित था। उन्होंने वक्षस्थल पर जो रत्नजटित हार धारण कर रखा था ;उससे दिव्य दीप्ति निःसृत हो रही थी।उनकी भुजाओं मे केयूर, कंकण, वलय आदि आभूषण सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने कानों मे जो रत्नकुण्डल धारण कर रखा था, उससे उनके मनोहर कपोलों की रमणीयता और अधिक बढ़ गयी थी। उनकी दन्तपंक्ति मणियों एवं रत्नों की शोभा को भी लज्जित कर रही थी। उनके अधर एवं ओष्ठ सुन्दर बिम्बाफल के समान सुशोभित हो रहे थे। पैरों में रत्नाभ महावर विराजमान थीं। उनके एक हाथ मे रत्नजटित दर्पण और दूसरे हाथ में  क्रीडा कमल सुशोभित हो रहा था।
पार्वती जी के शरीर की शोभा अत्यन्त सुन्दर एवं अवर्णनीय थी। उनके सम्पूर्ण शरीर में  चन्दन, अगरु, कस्तूरी और कंकुम का अंगराग सुशोभित था। उनके पैरों की पायजेब मधुर संगीत बिखेर रही थी। उनके इस दिव्य रूप को देखकर सभी देवता भक्तिभाव से नतमस्तक हो गये। भगवान्  शिव जी भी कनखियों के द्वारा पार्वती जी में सती जी की आकृति का अवलोकन किया, जिससे उनकी विरह वेदना समाप्त हो गयी। उनके सम्पूर्ण अंग रोमाञ्चित हो उठे।उस समय ऐसा प्रतीत होता था, मानो गौरी जी भगवान् शिव की आँखों में  समा गयी हों।
पार्वती जी अपने कुल देवी का पूजन करने लगीं। उनके साथ अनेक ब्राह्मण पत्नियाँ भी विद्यमान थीं। पूजनोपरान्त सभी  स्त्रियाँ हिमालय के राजभवन मे चली गयीं। बाराती भी जनवासे मे जाकर विश्राम करने लगे।
द्वार पूजा के बाद बारात जनवासे वापस गयी। चढ़ाव-चढ़त का जब समय आया तब भगवान् विष्णु आदि देवताओं ने वैदिक एवं लौकिक रीति का पालन करते हुए भगवान् शिव के द्वारा दिये गये आभूषणों से पार्वती जी को अलंकृत किया। धीरे-धीरे कन्यादान की मुहूर्त सन्निकट आ गयी। वर सहित बारातियों को बुलाया गया। भगवान् शिव बाजे गाजे के साथ हिमालय के घर पहुँचे। हिमवान ने श्रद्धा भक्ति के साथ भगवान्  शिव को प्रणाम किया और उनकी आरती उतारी। फिर उन्हें रत्नजटित सिंहासन पर बैठाया। आचार्यों ने मधुपर्क आदि क्रियायें सम्पन्न कीं। फिर पार्वती जी को उचित स्थान पर बैठाकर पुण्याहवाचन आदि किया गया।
अब कन्यादान का समय आ गया। हिमवान के दाहिनी ओर मैना और सामने पार्वती जी विराजमान हो गयीं। इसी समय हिमवान ने शाखोच्चार के उद्देश्य से भगवान् शिव से उनका गोत्र, प्रवर, शाखा आदि के विषय में पूछा। भगवान् शिव ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब नारद ने कहा, “हे पर्वतराज!  तुम बहुत भोले हो, तुम्हारा प्रश्न उचित नहीं है, क्योंकि इनके गोत्र, कुल आदि के बारे में भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु आदि भी नहीं जानते हैं। दूसरों के द्वारा जानने का प्रश्न ही नहीं उठता है। ये प्रकृति से परे निर्गुण, निराकार, परब्रह्म परमेश्वर, परमात्मा हैं और गोत्र, कुल, नाम आदि से रहित स्वतन्त्र एवं परम पिता परमेश्वर हैं। परन्तु स्वभाव से अत्यन्त दयालु और भक्तवत्सल हैं। ये केवल भक्तों का कल्याण करने के लिए ही साकार रूप धारण करते हैं। इसलिए इनके गोत्र, प्रवर आदि जानने के भ्रमजाल मे मत फँसिये।
नारद जी की बातों को सुनकर हिमालय को ज्ञान हो गया।उनके मन का सम्पूर्ण विस्मय नष्ट हो गया।उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए भगवान्  शिव के लिए अपनी कन्या का दान कर दिया। 
इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर। भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥ 
भगवान् शिव प्रसन्नता पूर्वक वेदमन्त्रों के साथ पार्वती जी के कर कमलों को अपने हाथ में ग्रहण कर लिया। फिर क्या था, सम्पूर्ण त्रैलोक्य में जय जयकार का शब्द गूँजने लगा। इसके बाद शैलराज ने भगवान् शिव को कन्यादान की यथोचित सांगता प्रदान की। साथ ही अनेक प्रकार के द्रव्य, रत्न, गौ, अश्व, गज, रथ आदि प्रदान किया। इसके बाद विवाह की सम्पूर्ण क्रियायें सम्पन्न की गयीं। मंगल गीत गाये जाने लगे। ज्योनार हुआ। सुन्दरी स्त्रियों ने मीठे स्वरों में गाली गाईं। फिर महामुनियों ने वेदों में वर्णित रीति से भगवान् महादेव और जगत्जननी पार्वती जी का विवाह सम्पन्न करा दिया। हिमाचल ने दास, दासी, रथ, घोड़े, हाथी, गौएँ, वस्त्र, मणि आदि अनेक प्रकार की वस्तुओं को अन्न तथा सोने के बर्तनों के साथ दहेज के रूप में गाड़ियों में लदवा दिया।
इस प्रकार विवाह सम्पन्न हो जाने पर भगवान् शिव माता पार्वती के साथ अपने निवास कैलाश पर्वत में चले आये। वहाँ शिव पार्वती विविध भोग विलास करते हुए समय व्यतीत करने लगे।
सती का प्रेम उन्हें पार्वती के रूप में पुनः इस धरा पर लाकर शिव की अर्धांगिनी बनाकर उनके प्रेम को अमर कर दिया। उनके अमर प्रेम को प्रणाम !
सती और शिव विवाह :: एक दिन माता सती भ्रमण के लिए निकलीं तो ऋषि दधीचि उन्हें दंडवत प्रणाम किया और शिव महिमा का बखान किया। महल में जाकर माता सती ने भगवान् शिव से विवाह की इच्छा जाहिर की जिससे दक्ष  हो गए। माँ सती दक्ष के महल और सुख सुविधाओं का त्याग कर मन में भगवान्  शिव से विवाह की इच्छा ले वन में तपस्या के लिए चलीं गईं। माँ सती के आवाहन पर भगवान् शिव ने प्रकट हो माँ सती को दक्ष के पास लौटने की सलाह दी।
प्रसूति के कहने पर दक्ष ने माँ सती के लिए उचित वर खोजने लगा। सती के विवाह हेतु दक्ष ने स्वयंवर का आयोजन किया और जिसमें सभी देवता, दैत्य, गन्धर्व, किन्नर इत्यादि को निमंत्रित किया गया, परन्तु त्रिशूल धारी भगवान् शिव को नहीं बुलाया। भगवान् शिव को अपमानित करने के उद्देश्य से प्रजापति दक्ष ने स्वयंवर में द्वारपाल की जगह सिर झुकाये भगवान् शिव की प्रतिमा स्थापित कर दी। 
उस सभा में सभी देव, दैत्य, मुनि इत्यादि आये। सभी अतिथिगण वहाँ नाना प्रकार के दिव्य वस्त्र तथा रत्नमय अलंकार धारण किये हुए थे, वे नाना प्रकार के रथ तथा हाथियों पर आयें थे। इस विशेष अवसर पर भेरी (नागड़ा), मृदंग और ढोल बज रहें थे, सभा में गन्धर्वों द्वारा सुललित गायन प्रस्तुत किया जा रहा था। सभी अतिथियों के आने पर दक्ष प्रजापति ने अपनी त्रैलोक्य-सुंदरी कन्या सती को सभा में बुलवाया। इस अवसर पर भगवान् शिव भी अपने वाहन वृषभ में सवार होकर वहां आये, सर्वप्रथम उन्होंने आकाश से ही उस सभा का अवलोकन किया।
दक्ष ने अपनी कन्या सती से कहा, “पुत्री यहाँ एक से एक सुन्दर देवता, दैत्य, ऋषि, मुनि एकत्रित हैं, तुम इनमें से जिसे भी अपने अनुरूप गुण-सम्पन्न युक्त समझो, उस दिव्य पुरुष के गले में माला पहना कर, उसको अपने पति रूप में वरन कर लो।” सती देवी ने आकाश में उपस्थित भगवान्  शिव को प्रणाम कर वर माला को भूमि पर रख दी। भूमि पर रखी हुई वह माला भगवान् शिव के गले स्वतः पहुँच गई तो भगवान शिव अकस्मात् ही उस सभा में प्रकट हो गए। उस समय भगवान् शिव का शरीर दिव्य रूप-धारी था, वे नाना प्रकार के अलंकारों से सुशोभित थे, उनकी शारीरिक आभा करोड़ों चन्द्रमाओं के कांति के समान थीं। सुगन्धित द्रव्यों का लेपन करने वाले, कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त भगवान्  शिव देखते-देखते प्रसन्न मन युक्त हो वहाँ से अंतर्ध्यान भी हो गए।
तत्पश्चात माँ सती ने स्वयंवर में एक अन्य माला, भगवान् शिव से अपने आत्मिक प्रेम को आधार बना, उनका आवाहन कर भगवान् शिव की प्रतिमा को वरमाला डालकर भगवान्  शिव को अपने पति रूप में वरण कर लिया। अब भगवान् शिव ने प्रकट होकर माँ सती को अपनी भार्या के रूप में स्वीकार कर लिया। दक्ष द्वारा इस विवाह को नहीं मानने पर ब्रह्म देव और भगवान् विष्णु ने दक्ष को लताड़ा तो उसने यह रिश्ता स्वीकार कर लिया। शिव-सती के मिलन से चारों दिशाओं में हर्ष पैदा हो गया। इस विवाह से शिव सती दोनों पुनः सम्पूर्णता को प्राप्त हुए। माँ सती दक्ष के महल से विदा हो शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं। 
सती और शिव का विवाह तो दक्ष ने करा दिया, लेकिन अपने अपमान और अपने मन से भगवान् शिव के प्रति वैमनस्य भाव को नहीं मिटा पाया। सती द्वारा भगवान्  शिव का वरण करने के परिणाम स्वरूप, दक्ष प्रजापति के मन में सती के प्रति प्रेम कम हो गया था।
सती के विदा होने के पश्चात दक्ष प्रजापति, शिव तथा सती की निंदा करते हुए रुदन करने लगे। इस पर उन्हें दधीचि मुनि ने समझाया, "तुम्हारा भाग्य पुण्य-मय था, जिसके परिणाम स्वरूप सती ने तुम्हारे यहाँ जन्म धारण किया, तुम शिव तथा सती के वास्तविकता को नहीं जानते हो। सती ही आद्या शक्ति मूल प्रकृति तथा जन्म-मरण से रहित हैं, भगवान्  शिव भी साक्षात् आदि पुरुष हैं, इसमें कोई संदेह नहीं हैं। देवता, दैत्य इत्यादि, जिन्हें कठोर से कठोर तपस्या से संतुष्ट नहीं कर सकते उन आद्या शक्ति मूल प्रकृति को तुमने संतुष्ट किया तथा पुत्री रूप में प्राप्त किया। अब किस मोह में पड़ कर तुम उनके विषय में कुछ नहीं जानने की बात कर रहे हों? उनकी निंदा करते हो"?
इस पर दक्ष ने अपने ही पुत्र मरीचि से कहा, “आप ही बताएँ कि यदि शिव आदि-पुरुष हैं एवं इस चराचर जगत के स्वामी हैं, तो उन्हें श्मशान भूमि क्यों प्रिय हैं? वे विरूपाक्ष तथा त्रिलोचन क्यों हैं? वे भिक्षा-वृति क्यों स्वीकार किये हुए हैं? वे अपने शरीर में चिता भस्म क्यों लगते हैं?”
इस पर मुनि ने अपने पिता को उत्तर दिया, “भगवान्  शिव पूर्ण एवं नित्य आनंदमय हैं तथा सभी ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, उनके आश्रय में जाने वालो को दुःख तो है ही नहीं। आपकी विपरीत बुद्धि उन्हें कैसे भिक्षुक कह रही हैं? उनकी वास्तविकता जाने बिना, आप उनकी निंदा क्यों कर रहे हो? वे सर्वत्र गतिमान और व्याप्त हैं। उनके निमित्त श्मशान या रमणीय नगर दोनों एक ही हैं, शिव लोक तो बहुत ही अपूर्व हैं, जिसे भगवान् ब्रह्मा तथा भगवान् श्री हरी विष्णु भी प्राप्त करने की आकांशा करते हैं। देवताओं के लिए कैलाश में वास करना दुर्लभ हैं। देवराज इंद्र का स्वर्ग, कैलाश के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हैं। इस मृत्यु लोक में वाराणसी नाम की रमणीय नगरी भगवान् शिव की ही हैं, वह परमात्मा मुक्ति क्षेत्र हैं, जहाँ भगवान् ब्रह्मा आदि देवता भी मृत्यु की कामना करते हैं। यह तुम्हारी मिथ्या भ्रम ही हैं कि श्मशान के अतिरिक्त उनका कोई वास स्थान नहीं हैं। व्यर्थ मोह में पड़कर भगवान् शिव तथा सती की निंदा  मत करो।
मुनि दधीचि द्वारा समझाने पर भी दक्ष प्रजापति के मन से उन दंपति शिव तथा सती के प्रति हीन भावना नहीं गई तथा उनके बारे में निन्दात्मक कटुवचन बोलते रहें। वे अपनी पुत्री सती की निंदा करते हुए विलाप करते थे, “हे सती! हे पुत्री! तुम मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय थीं, मुझे शोक सागर में छोड़-कर तुम कहाँ चली गई। तुम दिव्य मनोहर अंग वाली हो, तुम्हें मनोहर शय्या पर सोना चाहिये, आज तुम उस कुरूप पति के संग श्मशान में कैसे वास कर रहीं हो?”
इस पर दधीचि मुनि ने दक्ष को पुनः समझाया, “आप तो ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं, क्या आप यह नहीं जानते हैं कि उस स्वयंवर में इस पृथ्वी, समुद्र, आकाश, पाताल से जितने भी दिव्य स्त्री-पुरुष आयें थे, वे सब इन्हीं दोनों आदि पुरुष-स्त्री के ही रूप हैं। तुम उस पुरुष (भगवान् शिव) को यथार्थतः अनादि (प्रथम) पुरुष जान लो तथा त्रिगुणात्मिका परा भगवती तथा चिदात्मरूपा प्रकृति के विषय में अभी अच्छी तरह समझ लो। यह तुम्हारा दुर्भाग्य ही हैं की तुम आदि-विश्वेश्वर भगवान् तथा उनकी पत्नी परा भगवती सती को महत्व नहीं दे रहे हो। तुम शोक-मग्न हो, यह समझ लो की हमारे शास्त्रों में जिन्हें प्रकृति एवं पुरुष कहा गया हैं, वे दोनों आद्या शक्ति मूल प्रकृति सती तथा भगवान् शिव ही हैं।”
पुनः दक्ष बोले कि आप उन दोनों के सम्बन्ध में ठीक ही कह रहें होंगे, परन्तु मुझे नहीं लगता हैं कि शिव से बढ़कर कोई और श्रेष्ठ देवता नहीं हैं। यद्यपि ऋषिजन सत्य बोलते हैं, उनकी सत्यता पर कोई संदेह नहीं होना चाहिये, परन्तु मैं यह मानने को सन्नद्ध नहीं हूँ कि शिव ही सर्वोत्कृष्ट हैं। इसका मूल करण हैं, जब मेरे पिता ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थीं, तभी रुद्र भी उत्पन्न हुए थे, जो शिव समान शरीर तथा भयानक बल वाले थे। वे अति-साहसी एवं विशाल आकर वाले थे, निरंतर क्रोध के कारण उनके नेत्र सर्वदा लाल रहते थे, वे चीते का चर्म पहनते थे, सर पर लम्बी-लम्बी जटाएं रखते थे। एक बार दुष्ट रूद्र ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित इस सृष्टि को नष्ट करने उद्यत हुए तो, ब्रह्मा जी ने उन्हें कठोर आदेश देकर शांत किया, साथ ही मुझे आदेश दिया की भविष्य में ये प्रबल पराक्रमी रुद्र ऐसा उपद्रव न कर पायें तथा आज वे सभी मेरे वश में हैं। ब्रह्मा जी की आज्ञा से ही ये रौद्र-कर्मा रुद्र भयभीत हो मेरे वश में रहते हैं। रुद्र अपना आश्रय स्थल एवं बल छोड़ कर मेरे अधीन हो गए हैं। अब मैं पूछता हूँ कि जिनके अंश से संभूत ये रुद्र मेरे अधीन हैं, तो इनका जन्म दाता मुझ से कैसे श्रेष्ठ हो सकता हैं? सत्पात्र को अधिकृत कर दिया गया दान ही पुण्य प्रद एवं यश प्रदान करने वाला होता है। मेरी इतनी गुणवान और सुन्दर पुत्री को क्या मेरी आज्ञा में न रहने वाला वह शिव ही मिला था? मैंने अपनी पुत्री का दान उसे कर दिया। जब तक रुद्र मेरी आज्ञा के अधीन हैं, तब तक मेरी ईर्ष्या शिव में बनी रहेंगी।
इस तरह से दक्ष अपने मन में उत्पन्न हुए भावों को छुपा नहीं पाये और भगवान् शिव के प्रति उदासीन ही रहे। इसके साथ-साथ ही अपनी पुत्री सती के प्रति भी उनका क्रोध बढ़ते ही गया।

Wednesday, October 31, 2018

KAM DEV काम देव

KAM DEV काम देव
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
Kam Dev is the deity-demigod of love and sexuality. Kam means sensuous love, wish, desire, longing or sexuality. Atharv Ved has described Kam as desire and not sexual enjoyment.
Pradumn Ji got incarnation to provide body to the Kam Dev who was turned to ashes by Bhagwan Shiv. Pradumn Ji was took birth-incarnation as the son of Bhagwan Shri Krashn and Maa Laxmi as Rukmani Devi. Later during war when Bhagwan Shri Krashn under took to eliminate the remaining wicked, sinner kings-Ashw Medh Yagy, Brahma Ji along with Chandr Dev merged into the body of Pradumn Ji's  body at the occasion of the assimilation of Kam Dev in the body of Pradumn Ji.
Kam Dev is the demigod of the heavenly planets that are responsible for inducing lusty desires-Lasciviousness. Kam Dev is the son of Brahma Ji-embodiment of Bhagwan Brahma, to activate the humans to reproduce. Kam Dev is not worshipped on a larger basis. Kam Dev is portrayed as young, handsome man with wings carrying a bow and arrows. His bow is made of sugarcane with a cord of honeybees and arrows of sweet-smelling Ashok tree flowers, white and blue lotus flowers, Jasmine and Mango tree flowers. Kam Dev is seen sitting on a Parrot. Kam Dev is the demigod of love and is the husband of Rati and Preeti. 
KLEEM represents the divine power of attraction creating vibration in the environment to appease the opposite sex. It comprises of K k क, L l ल , ई ee, and M m म्. Kleem is the cause of the perfect union between the gross body dissolving into the causal body. Kleem itself represent Maha Kali. The Kleem sound invokes in the individual the desire, movement towards and action of service to Shri Krashn. 
MANTR :: Om Kleem Para Shakti Namah:
The single sound vibration of this Beej Mantr "KLEEM" can bring whatever one desire in the heart.
This Mantr relates to Sundari, the Goddess of love and beauty and also to Bhagwan Shri Krashn-The Kameshwar, 
Kleem carries the "Akrashan Shakti" or the Power of Attraction, and can be used by both men and women to increase the love energy and to fulfill one's wishes.
K क  represents the cause-Kam Dev and the inborn desires. It moves one closer to Almighty Bhagwan Shri Krashn, the cause.
LEE ली  stands for the gross body, manifested existence-Indr, the ruler of Heaven and also the governor of senses and material needs.
Mm म् anuswar अनुस्वर means perfection-full moon or satisfaction. M m (Naad and bindu) which bring happiness and love. Om Kleem Pra Shakti Namah:. 
TANTRIC-BEEJ MANTR (बीजमंत्र) :: These three Matr are a form of prayer, performed by the Tantrik. Any normal-common man can also perform these prayers. Those who recite these Mantr with good intentions, are blessed with might and power.
(1). ॐ  ऐं  ह्रीं  क्लीं चामुंडाय  विच्चै  फट  स्वाहा:। 
Om Aim Hreem Kleem Chamunday Vichae Phat Swaha. 
(2). ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमल वासिन्ये फट स्वाहा:। 
Om Shreem Hreem Kleem Aim Kamal Vasiney Phat Swaha.
(3).  ॐ श्रीं  ह्रीं  क्लीं  दक्षिणायै  फट स्वाहा:। 
Om  Shreem Hreem Kleem Dakshinayae Phat Swaha.
OM AIM HREEM KLEEM CHAMUNDAYE VICHCHYE NAMAH (ॐ  ऐं  ह्रीं  क्लीं चामुंडाय  विच्चै नमः) is the complete Mantr. It means the worship of Maa Bhagwati Durga, who removes the effect of all types of black magic, unfavourable effect of negative planets, bad luck, health problems or problems posed by enemies. Kleem Mantr help one create harmony in his relationships. This is the beginning of true human emancipation and freedom from the endless cycle of birth, death, old age and disease. This Kleem Mantr is quite powerful in order to get love from the opposite gender-sex. Regular chanting of the third Mantr and praying to Kam Dev helps in achieving greater sensitivity. It also helps in the awareness of others emotional needs and appreciation of one’s partner.
Chant the Kleem Mantr for 108 times each day in the early hours of morning and evening. The Mantr Siddhi (fulfilment) is said to be attained after 21 days of chanting. This Kam Dev Mantr can also be used by lovers to keep their affection evergreen. It is important to maintain pious practices like having only vegetarian food, taking bath before chanting the Mantr and having sincerity in prayers, so that one may gain full benefits from the Mantr.
Gandarbh-Dancers  chant this Mantr, as they need to have charm and grace that can greatly entertain their audience and gather appreciation. It activates the charm, grace and beauty of the dancer and his performance will improve. 
Those who are ascetics, enunciators, released, relinquished are never lured by Kam Dev. Those who pray to Bhagwan Shiv are free from the impact of Kam Dev.
जो मंगली है, जिसका शुक्र उठा हुआ है, जिसका चन्द्र जरूरत से ज्यादा उठा हुआ हुआ है, वो बड़े आराम से काम देव का शिकार हो सकता है। जो मंगल का व्रत रखता है, हनुमान जी की आराधना करता है, वो इस विकार से मुक्त हो सकता है। 
One who worship Bhagwan Shiv and Maa Gouri can not be affected by this evil, provided he indents to be free from sensuality, passions, sexuality, lust.
MADAN KAM DEV TEMPLE ASSAM :: One of the temples which induce humans to reproduction like Khajuraho & Pashupati Nath temple, is present in Assam, as well. The erotic sculptures in the Madan Kam Dev temple have made it known as the Mini Khajuraho of the North-East. This temple is just 40 km away from Guwahati and is situated atop a hill by the name of Dewan Giri in Kam Rup district. The Madan Kam Dev temple is a place of utmost scenic beauty with abundance of greenery all around and carved images and sculptures, that speak volumes of the grandeur of Assam’s architecture in the medieval era.
Ruins of more than 13 temples, dedicated to Bhagwan Shiv, including the main temple in a vast area under the Dewan Giri-hill have been uncovered so far. The main temple is the Madan Kam Dev temple, which displayed a sculpture of Bhagwan Shiv or Maheshwar with Maa Parvati, Gouri, Uma. The entire region had been built in five sections or Panch Rath. The ruins of the temples displayed images of griffin, a creature with a lion’s body and the head and wings of an eagle, sculptures of nymphs, dancing fairies, Shiv and Shiva-Maa Parwati and other Gods, Goddesses and demigods-deities have been engraved in grandiose appearance. One will find well-decorated and beautifully carved door frames, walls, pillars. Some of these have been engraved with images of flowers and animals, including the Kalp Vraksh-the tree that fulfils all desires. 
Some other interesting architecture seen in this area are the four-headed Bhagwan Shiv, six-sided Bhaerav, serpents, demons and men, women and animals in every form of erotic postures, which made the region look more like the Khajuraho temples. Another highlight of the Kam Dev temple is the gigantic proportion of the ruin of Madan Kam Dev. The art and architecture, which vividly depict the acts of love and passion, have a close similarity with the art of Khajuraho temple. 
This is the place of rebirth of Kam or Madan, after he was turned into ashes by Bhagwan Shiv by opening his third eye. Here Madan united with his wife Rati in this tiny hillock after he was reborn. The place is truly known as the Madan Kam Dev because of the numerous erotic sculptures.
In Madan Kam Dev temple, devotees pray facing the opposite direction-west. This temple exhibit nudity in the deities to attract the humans to reproduction. No other temple in Assam exhibit such erotic idols, art work, in the form of idols or sculptures. 
The lush green forests of the Dewan Giri-hill, Madan Kuri river flowing below it, along with the vast expanse of swampy land till the Gopeshwar hill on the west make this region all the more beautiful.
कामदेव वशीकरण मंत्र :: 
ॐ नमो भगवते कामदेवाय यस्य यस्य दृश्यो भवामि। 
यश्च यश्च मम मुखं पश्यति तं तं मोहयतु स्वाहा॥

 
Contents of these above mentioned blogs are covered under copy right and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Wednesday, August 15, 2018

STORY TELLING किस्सा कहानी

STORY TELLING किस्सा कहानी
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com  bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com     santoshhindukosh.blogspot.com
राजा भोज और चार चोर :: एक बार रात के समय चार चोर धारा नगरी में चोरी करने निकले। राजा भोज भी कभी-कभी भेष बदल कर अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए महल से बाहर निकलते थे। उस रात राजा भोज जब घूम रहे थे तो उनकी मुलाक़ात चार चोरों से हुई। चोरों ने भेष बदले राजा से पूछा कि तू कौन है? राजा ने कहा, "जो तुम हो वही मैं भी हूँ"। राजा समझ गये कि ये चोर हैं। सो उन्होंने  उन चोरों से कहा, "यह भी खूब रही, भगवान् संयोग मिलाता है, तो इस तरह भी मिलाता है; मैं भी चोर हूँ। आज रात को हम पाँचों मिल कर चोरी करते हैं और जो माल मिलेगा उसे पाँच जगह बराबर बराबर बाँट लेंगे"। चोरों ने कहा, "तुममें क्या गुण है? हम तुम्हें साथ क्यों ले जाएँ और तुम्हें क्यों हिस्सा दें"? 
राजा ने कहा, "पहले तुम बताओ कि तुममे क्या क्या गुण हैं, फिर मैं अपना गुण बताऊंगा"?
उनमें से एक चोर ने कहा, "मैं आँख बंद करके बता सकता हूँ कि धन कहाँ पड़ा है"। 
दूसरे ने कहा, "मुझे देखते ही सब पहरेदारों को नींद आ जाती है"।  
तीसरे ने कहा, "मैं जिस ताले को देख लेता हूँ, वह खुद-ब-खुद खुल जाता है"। 
चौथे ने कहा, "मैं जिस व्यक्ति को एक बार देख लूँ, उसे मैं अँधेरे में भी पहचान सकता हूँ"।
इस पर राजा ने कहा, "फिर तो हमें धन मिलने मैं कोई अड़चन नहीं होगी"। 
चोरों ने कहा, "सो तो ठीक है, लेकिन तुम भी तो अपना गुण बताओ, जिसके बल पर तुम हमसे अपना हिस्सा माँग रहे हो"। 
राजा बोले, "न्यायाधीश के सामने मैं जाकर अगर खड़ा हो जाऊं तो उसकी मति फिर जाती है और वह अपनी सुनाई हुयी फाँसी की सजा भी रद्द कर देता है"। 
चोरों ने कहा, "तब तो ठीक है, अब पकडे जाने पर सजा का भय भी नहीं रहेगा"। 
पाँचों  चोरी करने के लिए निकले। पहले चोर ने आँखें बंद कर के बताया कि राजा के तहखाने में फलां जगह माल रखा है।  पहले वहीँ चला जाए। 
पाँचों राजा के तहखाने में चोरी करने पहुँचे। वहाँ संगीनों का पहरा था। दूसरा चोर आगे बढ़ा तो पहरेदार अपने आप गहरी निद्रा में चले गए। अब तीसरा चोर आगे बढ़ा, तो जितनी भी तिजोरियां वहाँ रखी थीं, उन सबके ताले अपने आप खुल गए।  
चोरों ने खूब धन बटोरा और गठरियों में बाँध कर बाहर निकल आये। दूर जंगल में लाकर सारा धन एक गहरा गड्ढा खोद कर गाड़ दिया और तय किया कि कल इसे आपस में बाँट लेंगे। चारों चोर अपने अपने घर चले गए और  राजा भी अपने महल में आकर सो गये। 
प्रातः होते ही हल्ला मच गया कि तहख़ाना टूट गया है और बहुत सा धन चोरी चला गया है। पहरेदारों को बुलाया गया। पूछने पर उन्होंने कहा, "महाराज, हमें तो कुछ पता नहीं कि यह चोरी कब और कैसे हुई? दोषी हम जरूर हैं और इसके लिए उचित सजा पाने के लिए हम इंकार नहीं करते, लेकिन सही बात तो यह है कि हम सारे लोगों को एक साथ ही ऐसी गहरी निद्रा आ गयी जैसे किसी ने जादू कर दिया हो"। 
विशेषज्ञों ने बताया कि ताले इतने मजबूत हैं और इतनी कारीगरी से बनाए गए हैं कि न तो ये सहज ही तोड़े जा सकते हैं, न इन्हें खोलने के लिए दूसरी चाबी ही बनाई जा सकती है. तब सवाल उठता है कि यह काण्ड हो कैसे गया। 
राजा ने कहा, "जो हुआ सो हुआ, किन्तु ऐसा लगता है कि कोई दैवी चमत्कार या देवी घटना हुयी है, लेकिन फिर भी इन चोरों का पता लगाने के लिए कोशिश तो होनी ही चाहिए"। चारों तरफ आदमी दौड़ाए गए। संयोग की बात कि चारों चोर एक ही जगह पकड़ में आ गए। वे न्यायाधीश के सामने पेश किये गए और न्यायाधीश ने उन्हें सूली पर चढाने का हुक्म दिया। 
चोरों को सूली पर लटकाने के लिए जब ले जाया जाने वाला था, तो राजा भोज भी न्यायाधीश के बगल में आ कर बैठ गये। राजा को देखते ही चौथा चोर जोर से चिल्लाया, "अरे तुम हो! अच्छी बात है,  "हम चारों ने तो अपने करतब, अपनी कला तुम्हें दिखा दी, अब तुम इस तरह पत्थर की मूरत बने क्या देख रहे हो? तुम भी अपना करतब दिखाओ। फिर दोस्ती किस दिन काम आयेगी"। 
सुन कर राजा भोज हँसे और उनकी सूली की सजा रद्द कर दी। चोरों को अपने पास बैठाया और उनसे कहा कि तुम जैसे गुणी आदमियों को चोरी जैसा नीच धंधा कभी नहीं करना चाहिए; बल्कि सुसंस्कृत नागरिक की तरह जीवन बिताना चाहिए. तुम लोग आज से मेरे पास रहो। 
चोरों ने उस दिन से चोरी करना छोड़ दिया और वे राजा की कृपा सम्मानपूर्वक जीवन बिताने लगे। 
ईमानदार डकैत :: बात उस ज़माने की बात है जब बलजी भुर्जी के नाम से राजस्थान का ज़र्रा ज़र्रा खौफ खाता था। बलजी भुर्जी का गिरोह डकैती के लिए जितना कुख्यात था, उससे कहीं ज्यादा अपने नियमों के लिए जाना जाता था. बलजी भुर्जी की इस धाक को देख कर एक अन्य डकैत नानिया के मन में उससे फ़ायदा उठाने की इच्छा पैदा हुई। वह जब तब किसी असहाय को लूट लेता और खुद को बलजी बताता। भय से लोग चुप रह जाते,पर चौंकते अवश्य कि आखिर बलजी भुर्जी की मति को क्या हो गया है?!
सेठ खेतसीदास पौद्दार बेहद सज्जन और दयालु प्रवृत्ति के इंसान थे। इधर एक बढ़िया नस्ल का ऊँट सेठ जी खरीद कर लाये थे। एक दिन सेठ जी अकेले ही ऊँट की सवारी कर रहे थे। सर्दी के सिहरन भरे दिनों में एक गरीब बूढ़े को देख कर जो उनसे रुकने की प्रार्थना कर रहा था, सेठ जी रूक गए। 
सेठ जी ने ऊँट को बैठने का संकेत किया। उन्होंने उस व्यक्ति को भी ऊँट पर बिठा लिया। कुछ दूर ही आगे चले होंगे कि सेठ जी को जोर का धक्का लगा और वे जमीन पर आ गिरे। क्षण भर को सेठ जी चौंके लेकिन यह देख कर उन्हें हैरानी और डर भी लगा कि जिसे उन्होंने दया कर के अपने साथ बिठाया था वह एक डाकू था। अब वे क्या करते। उन्होंने स्वर का नाम पूछा तो उसने कहा कि वह बालजी भुर्जी का आदमी है। सेठ जी ने उस व्यक्ति से प्रार्थना की कि वह इस घटना का ज़िक्र किसी से न करे वरना लोग किसी पर भरोसा नहीं करेंगे और गरीबों की मदद के लिए आगे नहीं आयेंगे। 
बात को दबाये रकने की कोशिश सेठ जी ने तो बहुत की लेकिन किसी प्रकार इस घटना की जानकारी बालजी भुर्जी को लग गई कि सेठ जी का ऊँट नानिया रूंगा के पास है। धीरे धीरे सेठ जी के दिमाग़ से यह घटना निकल गई। पर एक रोज वह चौंक गए। घर के दालान में ऊँट बँधा दिखाई दिया, वही ऊँट जिसे डाकू ले गया था। पास जा कर देखा तो उसके गले में एक तख्ती बढ़ी थी और लिखा हुआ था, "सेठ खेतसी दास को बलजी भूरजी की भेंट। हम डाकू हैं, पर धोखेबाज कतई नहीं"!
चौंकाने वाली बात तो यह थी कि जो आदमी ऊँट ले गया था, वह बालजी भूरजी का आदमी नहीं था। सेठ जी इसी सोच में डूबे थे कि किसी ने बताया, "झूंझनू के के पास की पहाड़ी की तलहटी में नानिया रूंगा की लाश पड़ी है"! सभी समझ गए कि असली डकैत कौन था। 
सुदर्शन ने यही कहानी डाकू खड़गसिंह के नाम से लिखी थी, मगर चोरी गया घोडा था न कि ऊँट।
पूर्व सूचना :: मिस्र का एक शासक एक रात स्वप्न में तैरता हुआ नील नदी पार कर गया। सुबह नींद टूटते ही उसने स्वयं को विश्व का सर्वश्रेष्ठ तैराक घोषित करवा दिया और इस सिलसिले में एक भव्य समारोह का आयोजन कर डाला। मंत्री, प्रजा और दूसरे लोग चकित थे। उन्हें शासक की बुद्धि पर तरस आ रहा था। एक लोकप्रिय जादूगर को इस अनोखे समारोह का पता चला तो वह तुरन्त शासक की सेवा में उपस्थित होकर नम्र स्वर में बोला, "प्रजापति, आपने कौन सी नील नदी तैर कर पार की थी"। "तू पागल हो गया है क्या", शासक दहाड़ा,"नील नदी मिस्र में एक ही है"। "लेकिन महाराज, यह नील नदी तो पिछले तीन दिन से सूखी पड़ी है"! उसने हाथ मलते हुए कहा। उसने दृष्टि भ्रम जादू का सहारा लिया था। सिंचाई मंत्री ने उसका समर्थन किया।  शासक ने तुरन्त नील नदी का निरीक्षण किया। नदी सचमुच सूखी पड़ी थी।कीचड़ ही कीचड़ नज़र आ रहा था। शासक ने दरबार में लौटते ही घोषणा की, "सिंचाई मंत्री का सर कलम कर दिया जाए! अगर मंत्री हमें नदी के सूखने की पूर्व-सूचना दे देता तो हम तैर कर हरगिज़ पार करने न जाते"। फाँसी के समय जादूगर ने शासक से विनम्र निवेदन किया, "प्रजापति, अब नील नदी पानी से लबालब भर गई है। कृप्या सिंचाई मंत्री को क्षमा कर दीजिये और बेशक नदी को तैर कर पार कीजिये"। उस दिन लोगों ने सांँस रोक कर एक भयानक दृश्य देखा। जादूगर और सिंचाई-मंत्री को एक साथ नदी में डुबाया जा रहा था।